Thursday, November 15, 2018

जितनी उम्र गुज़र रही है,
उतने शब्द कम पड़ रहे हैं,
उतनी बातें बढ़ रही है,
तो कहूं कैसे?
जितने पास आ रही है,
उतनी शिकन दिख रही है,
उतने आखों के नीचे के गड्ढे काले पड़ रहे हैं,
छुपाऊं कैसे?
जितना प्यार मिल रहा है,
उतना समय नहीं,
जितनी चाहत, ... उतना धैर्य।
जितने लोग जुड़ रहे हैं,
उतना अकेला पड़ रहा हूँ।
जितने जुदा, ... उतना ख़ाली।

जितना दर्द बढ़ रहा है,
उतना पानी कम पड़ रहा है,
मैं रोऊँ कैसे?


-मिस्रा





Sunday, November 4, 2018

एक बहुत ऊँची चट्टान पे,
बहुत सारी बर्फ़ पड़ी थी,
ये उसके बारे में नहीं है,
पास के पहाड़ों पे सफ़ेद आंधी चल रही थी,
और यहाँ बंकर सारे अंदर से बंद,
ये उसके बारे में नहीं है,
एक लड़की बहुत कूद -फांद कर रही थी,
कुछ दुरी पर,
और एक लड़का सन्न,
ये उसके बारे में नहीं है,
नदी, पहाड़, झरने, वादी, सभी तो लिखते हैं,
ये उसके बारे में नहीं है। 
पहाड़ी से थोड़ा नीचे उतरते ही,
दाहिनी ओर सड़क के एक छोटी सी गुमटी थी,
जहाँ चाय बन रही थी,
उसके कुछ ठीक दस कदम पे पश्चिम की ओर,
एक पेशाबखाना था, जहाँ सिटकिनी लगी थी,
बहुत invite कर रही थी,
ये उसके बारे में है,
कदम धीरे- धीरे बढ़ रहे थे, तीन चाय बोलने के बाद,
(अरे भाई, एक driver  भी तो था)
कितनी तेज़ लगी थी,
,.... कुण्डी भी,
कितनी मशक्क़त के बाद खुली थी,
और अंदर किवांड़ खोलने के बाद,
हफ़्तों की सूखी पड़ी हुई टट्टी बर्फ़ की चादर ओढ़े कितनी हसीन लग रही थी,
पैर फिसल रहे थे पीली बर्फ़ पे,
तो मानो earthy colors में एक रचना रच रही थी,
नीचे फ़र्श पे,
पूरे सफ़र में सिर्फ़ यही तस्वीर नहीं ली थी। 



-मिस्रा 









Friday, October 26, 2018

वो भी, ... मैं भी

न जाने प्यार कब और कैसे,
क़ब्ज़ेदारी में तब्दील हो जाता है।
अधिकार,अपेक्षाएं, ज़िम्मेदारियों के बोझ तले,
आदमी दबता जाता है।
तिलमिलाते हुए कई बार गर्दन निकालता है बाहर,
पर तब तक और मैला चढ़ जाता है।

कमज़ोरी सिर्फ़ दिमाग़ की होती है,
दिल तो बस झटके खाता है,
उसका भी, .. मेरा भी।

जुबां तक बार-बार बात आती है,
हलक़ में फंसे हुए आंसुओं की तरह,
पर प्यार न जाने कब कहाँ छन के गिर जाता है,
बात हो नहीं पाती और,
शब्द चुभते रहते हैं उन पलों में,
उसके भी,... मेरे भी।

कितनी छोटी है ज़िन्दगी,
और हम कितनी बड़ी बातें कर जाते हैं,
उनसे, जिनसे प्यार करते हैं,
क्यों नहीं गले से लगाते उस वक़्त,
ज़रुरत होती है जब,
उसको भी, ... मुझको भी।


-मिस्रा 

Monday, October 15, 2018

एक पल को खुद को इस सब से निकाल कर देखता हूँ,
तो बहुत अजीब लगता है,
ये नियम, क़ायदे,
तमगे, वायदे,
लोगों की हर एक बहस में टूट पड़ने की इच्छा।
हर एक party में जो जितना बचकाना होता है,
.. लोग उसे उतना पसंद करते हैं,
जितना loud, उतना important.
कितना आसान है, लोगों को रिझाना यहाँ,
पर मुझे अजीब लगता है।
लोगों को एक पल के लिए,
अगर हम currency मान लें,
तो यहां जो जितना ओछा है,
वो उतना अमीर होता है।
कितना आसान है,
नाम कमाना यहां,
तरीक़े हैं,..
पर मुझे अजीब लगता है।
न जाने कैसे खड़े रहते हैं लोग सतह पर,
यहाँ पर इतना बड़ा गड्ढा है,
मैं सोचता भर हूँ, तो धंसता जाता हूँ।


-मिस्रा

Friday, October 12, 2018

कैसे हर तरफ़ एक बन्दर नाच है,
उसी के बीच में नाच रही हो तुम,
....कैसे कितना व्याकुल हो तुम,
मैं हैरान हूँ ये देख कर,..
पहले तो छल्ले उड़ा -उड़ा  कर नशे में,
तुमने कैसे मेरे अरमानों को फूँक लिया,
नशा हुआ?
अब hangover तो होगा ही।
और ये सर तुम्हारा जो buzz कर रहा है न?
ये वो चरस है।
...जो अब भी बो रही हो !

बीमार हो तुम। 

 (ये कैसी कविता है?)


-मिस्रा








Friday, September 28, 2018

फिर से

फिर एक दिन,... नशा उतरता है,
और वो अकेला खड़ा पाता है, फिर से ख़ुद  को,
फिर से कोई तैर कर, बहुत दूर चला जाता है,
और वो हौसला दिलाता रहता है फिर से ख़ुद को,

फिर से सांसें बहुत तेज़ चलती हैं,
फिर से कोई अपना phone बंद करके सो जाता है,

फिर... एक दिन जादू टूटता है,

वो चादर का एक धागा खींच लेती है,
... और भागने लगती है,
वो भी भागता है पीछे-पीछे,
आवाज़ देता है,
पर वो छुप जाती है कहीं,
और वो उसे ढूंढ नहीं पाता है,
अकेला लौटता है उस रात,

रात बीतती है, दिन बदलता है,
फिर वो भी लौट आती है शाम तक,
पर वो चादर जिसका धागा नोच कर यूँ भागी थी वो,
तब तक काफ़ी छिज जाता है,

तो ठण्ड में वो भी सोती है,
और ठण्ड में वो भी सुलाता है  फिर से ख़ुद को।

-मिस्रा 

Wednesday, September 12, 2018

जबसे तुम गयी हो, बहुत नज़दीक आ गयी हो।

जबसे तुम गयी हो,
न वो बिस्तर बदला है,
न सिलवटों को छेड़ा है मैंने,
रात भर एक किनारा पकड़ कर सोया भी हूँ मैं,
रात भर तरसते हैं होंठ, .. छाती को तुम्हारे,
रात भर उँगलियाँ दर्द करती हैं,.. 
रात भर कोई गाना सुनाता है, ऐसा लगता है,
कोई फेरता है हाँथ बदन पर, ऐसा लगता है,
कोई कस कर पकड़ता है, ऐसा लगता है,


कितने नज़दीक आ गयी हो?
रात भर तुम्हारी तस्वीर बात करती है मुझसे,
तुम्हारे बालों के ख़म में उलझा भी हूँ और खोया भी हूँ मैं,
ऐसा लगता है,... 
जबसे तुम गयी हो,
बहुत नज़दीक आ गयी हो। 


-मिस्रा