Monday, October 15, 2018

एक पल को खुद को इस सब से निकाल कर देखता हूँ,
तो बहुत अजीब लगता है,
ये नियम, क़ायदे,
तमगे, वायदे,
लोगों की हर एक बहस में टूट पड़ने की इच्छा।
हर एक party में जो जितना बचकाना होता है,
.. लोग उसे उतना पसंद करते हैं,
जितना loud, उतना important.
कितना आसान है, लोगों को रिझाना यहाँ,
पर मुझे अजीब लगता है।
लोगों को एक पल के लिए,
अगर हम currency मान लें,
तो यहां जो जितना ओछा है,
वो उतना अमीर होता है।
कितना आसान है,
नाम कमाना यहां,
तरीक़े हैं,..
पर मुझे अजीब लगता है।
न जाने कैसे खड़े रहते हैं लोग सतह पर,
यहाँ पर इतना बड़ा गड्ढा है,
मैं सोचता भर हूँ, तो धंसता जाता हूँ।


-मिस्रा

Friday, October 12, 2018

कैसे हर तरफ़ एक बन्दर नाच है,
उसी के बीच में नाच रही हो तुम,
....कैसे कितना व्याकुल हो तुम,
मैं हैरान हूँ ये देख कर,..
पहले तो छल्ले उड़ा -उड़ा  कर नशे में,
तुमने कैसे मेरे अरमानों को फूँक लिया,
नशा हुआ?
अब hangover तो होगा ही।
और ये सर तुम्हारा जो buzz कर रहा है न?
ये वो चरस है।
...जो अब भी बो रही हो !

बीमार हो तुम। 

 (ये कैसी कविता है?)


-मिस्रा








Friday, September 28, 2018

फिर से

फिर एक दिन,... नशा उतरता है,
और वो अकेला खड़ा पाता है, फिर से ख़ुद  को,
फिर से कोई तैर कर, बहुत दूर चला जाता है,
और वो हौसला दिलाता रहता है फिर से ख़ुद को,

फिर से सांसें बहुत तेज़ चलती हैं,
फिर से कोई अपना phone बंद करके सो जाता है,

फिर... एक दिन जादू टूटता है,

वो चादर का एक धागा खींच लेती है,
... और भागने लगती है,
वो भी भागता है पीछे-पीछे,
आवाज़ देता है,
पर वो छुप जाती है कहीं,
और वो उसे ढूंढ नहीं पाता है,
अकेला लौटता है उस रात,

रात बीतती है, दिन बदलता है,
फिर वो भी लौट आती है शाम तक,
पर वो चादर जिसका धागा नोच कर यूँ भागी थी वो,
तब तक काफ़ी छिज जाता है,

तो ठण्ड में वो भी सोती है,
और ठण्ड में वो भी सुलाता है  फिर से ख़ुद को।

-मिस्रा 

Wednesday, September 12, 2018

जबसे तुम गयी हो, बहुत नज़दीक आ गयी हो।

जबसे तुम गयी हो,
न वो बिस्तर बदला है,
न सिलवटों को छेड़ा है मैंने,
रात भर एक किनारा पकड़ कर सोया भी हूँ मैं,
रात भर तरसते हैं होंठ, .. छाती को तुम्हारे,
रात भर उँगलियाँ दर्द करती हैं,.. 
रात भर कोई गाना सुनाता है, ऐसा लगता है,
कोई फेरता है हाँथ बदन पर, ऐसा लगता है,
कोई कस कर पकड़ता है, ऐसा लगता है,


कितने नज़दीक आ गयी हो?
रात भर तुम्हारी तस्वीर बात करती है मुझसे,
तुम्हारे बालों के ख़म में उलझा भी हूँ और खोया भी हूँ मैं,
ऐसा लगता है,... 
जबसे तुम गयी हो,
बहुत नज़दीक आ गयी हो। 


-मिस्रा 


 

Tuesday, September 4, 2018

potent

यहाँ एक गंध है जो उँगलियों में कहीं रह जाती है,
थूक में बनी हुई खाल की चाशनी की गंध,
'potent'. 
यहाँ दो जांघें हैं,
जिनके सिरे पर फिसलन है,
किसी नदी घाटी के किनारे जमी काई पे पड़ी बारिश की बूंदों सी... 
जिस पर हाथ पड़ते ही इंसान फिसल जाता है,
कोई कैसे रोके ख़ुद को, जब ईमान फिसल जाता है। 
यहाँ पुतलियों में डूब जाती हैं नज़रें,
पलकों में उलझ जाती है ज़िन्दगी,
यहाँ तर्जनी कुछ ढूँढा करती है,
उसकी भी,... 
... मेरी भी। 
यहाँ एक गंध है जो तर्जनी में कहीं रह जाती है,
थूक में थकी हुई भ्रमण की सूखी हुई गंध। 


-मिस्रा 







Thursday, August 30, 2018

ये ज़िन्दगी यूँ हाथ छोड़ देती है,
और आदमी कितना भी कोशिश कर ले,
पर फिसल जाता है,
कोई कुछ नहीं कर पाता,
फिर दुआएं होती हैं,
दवाएं होती हैं,
एक लड़का पैर सहलाता रहता है,
और एक पिता बीच- बीच में उठ कर,
उसको गले लगाता रहता है।
कितना मुश्क़िल होता है,
मौत का सामना करना,
एक countdown सा चलता रहता है
जिसका alarm और भी तेज़ होता जाता है,
कितना मुश्क़िल होता है,
सब जान कर भी तसल्ली देना,
"कुछ नहीं हुआ तुम्हें
ये दर्द है, जो सिर्फ़ सोचते हो तो है,
ये ज़िन्दगी भी इसी तरह, सिर्फ़ सोचते हो तो है। "
ये सिर्फ़ मौत है जो कोई सोचता नहीं,
... फिर भी है।


कितनी खोखली है ज़िन्दगी,
और मौत कितनी बुरी है,
तभी शायद ज़िनदगी समझ नहीं पाती, बस चलती रहती है यूँहीं,
और मौत से कोई किसी को बचा नहीं पाता।



-मिस्रा




आख़िर हमने ढूढ़ लिया,
वक़्त लगा,
दिल टूटे,
हमको कितनो ने नोचा। 
... तुमको कितनों ने बदनाम किया,
कितना बुझता है दिल,
ये सुन कर,
तुम कितनी अकेली थी उस पल,
मैं कितना .. तन्हां था। 
कितना मुश्किल था,
बिना तुम्हारी साँसों के,
क्या जाने ...  कैसे ज़िंदा था ?

मैंने तुमको,
तुमने मुझको,
आख़िर हमने ढूंढ लिया। 




-मिस्रा