Thursday, October 12, 2017

... और एक कम्बल था ।

खाल भी घिस रही थी खाल से,
और कुछ दिख भी नहीं रहा था,
अँधेरा था,..
... और एक कम्बल था,
तो, और भी अँधेरा था।
नाख़ून थे जो चुभ भी रहे थे,
और कुछ दुख भी नहीं रहा था,
पसीना था,.
...और एक कम्बल था,
तो और भी पसीना था।
रगड़ थी,..
रगड़ते- रगड़ते, बहुत कुछ हो भी रहा था,
सटा था,
... और एक कम्बल था,
तो जिस्म जिस्म से और भी सटा था।
हाथ फिसल रहा था,
और बहुत कुछ दब  भी रहा था,
ज़बान रुक ही नहीं रही थी,
और दांतों से जगह जगह कट भी रहा था,
कटना तो था ही,
पर एक ही कम्बल था,
तो और भी कट रहा था।
... एहसास था,
की जो छू रहा था,
वो प्यार नहीं था,
पर छिपना था कहीं,
....और एक ही कम्बल था,
बस दोनों को उस रात कहीं छिपना था।

-प्रणव मिश्रा

Friday, August 18, 2017

...और शाम हो जाती थी।

महीनों गुज़र जाते हैं..
गुज़ारिश करते-करते,
पर अब वो पहले की तरह... 
नहीं छूती मुझे,
मेरी छाती पर जो चेहरा रख कर,
फुसफुसाती थी,
मेरे कानों पर उंगलियां चलाते हुए,
मेरी गर्दन पर नाख़ून,
मेरे चेहरे से उतर कर कब उसकी साँसे दिल तक पहुँच जाती थीं,
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
मौसम बदल जाते हैं,
उसका नाम लेते -लेते,
पर अब वो पहले की तरह... 
नहीं बुलाती मुझे,
मेरे होठों पर कितने घंटों ही,
फूंकती थी जान अपने होंठों से,
कहती थी,
बार-बार, तो यकीन नहीं होता था,
कि वो मेरी है,
और यकीन दिलाते-दिलाते,
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
शाम हो जाती थी... तब नशा होता था,
वो roll बड़ा अच्छा करती थी,
मेरे शरीर पर,
मैं पकड़ता था कमर पूरे हक़ से,
और वो कुछ नहीं कहती थी,
एक current सा लगता था हांथों में,
उसका हाथ पकड़ते ही,
वो जिस तरह से देखती थी पीछे मुड़ कर,
मैं सो नहीं पाता था उसके बिछड़ने  के डर से,
सुबह तक,
और सुबह से दोपहर,
और दोपहर से न जाने कब... 
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
पता है कल क्या बोली,
"बड़ा tiresome है ये"... "मतलब प्यार है, पर प्यार सब कुछ तो नहीं"
पूरी रात रोया मैं,
और लिख कुछ नहीं पाया,
काश कि वो देखती मुझे रोते हुए,
और कहती "कि प्यार है, तो पहले क्यों नहीं बोला"
पहले तो कुछ कहते ही नहीं थे,
और शाम हो जाती थी। 
शाम हो जाती थी, तो जान आती थी,
सब हल्का-हल्का सा लगता था,
अब तो एक वज़न है,
जो जीने नहीं देता,
दो साल हो गए और एक भी रात नहीं कटती,
उसको तरस भी नहीं आता मेरी हालत पर,
पहले तो पता ही नहीं चलता था,
की किसको ख़याल किसका पहले आया,
और शाम हो जाती थी। 




-प्रणव मिश्र 








Tuesday, July 18, 2017

बासमती चावल हो तुम

बस ये समझ लो कुछ देर को,
कि बासमती चावल हो तुम,
pressure cooker में तो जाना पड़ेगा,
अगर तैयार होना है,
(कच्चे कितने दिन गुज़ारोगे, और किसके घर पे,
पड़े पड़े एक दिन घुन लग ही जाएगा )
पर जितना ज़्यादा pressure मिलेगा,
उतना जल्दी पकोगे,
हाँ, .. थोड़ा घुटन होगी,
थोड़ा जलन होगी,
और कुछ नहीं दिखेगा कुछ देर को,
पानी ऊपर उठेगा, तो डर भी लगेगा,
काँपेगा, सर तक डूबा हुआ एक एक अंग,
धुंधला सा हो जाएगा सब कुछ, कुछ पलों को,
और आंच अगर धीमी हुई, तो थोड़ा time भी लग सकता है,
पर जब सीटी आएगी और ढक्कन खुलेगा,
तब तक तुम्हारे अलावा, जो भी हैं इर्द गिर्द,
और जितना भी है इर्द गिर्द,
सब भाप बन के उड़ जाएगा।
क्यूंकि किसी के बाप में नहीं हिम्मत, जो तुममे है,
बस कुछ देर को,
pressure cooker में तो जाना पड़ेगा,
फिर हर तरफ़ खुशबू भी होगी,
और स्वाद भी आएगा,
...ज़िन्दगी का।


-प्रणव मिश्र 






Monday, July 17, 2017

टुकड़ों में


एक लड़का दिखता है,
जब भी बचपन याद करता हूँ,
दुबला सा,
रौंगटे भर बाल आना शुरू हुए हैं गालों पर,
और वो, अपने तिमंज़िले मक़ान की,
छत के पीछे वाले कोने पे बैठ के,
सपनों का parabola नाप रहा है,
कि कितनी दूर जाएंगे,
पीछे मैदान में,
फेंकी हुई हर एक ईंट...
के टुकड़े से।
फिर, एक लड़का दिखता है,
bike पे अकेला चला जा रहा है,
कुछ मांस भर आया है,
और बाल कुछ बड़े हुए हैं,
और helmet सिर्फ़ इसलिए लगाया है,
क्यूंकि यकीन है,
कि उतारते ही पहचान लेंगे, सब लोग, ... अब से कुछ सालों के बाद,
तो practice बनी रहे,
कि जब वक़्त आये, तो uncomfortable महसूस न हो।
फिर,... एक लड़का है,
जो  ज़्यादा बोलता नहीं है,
बस या तो analyse कर रहा है,
या observe,
क्यूंकि वो जो कहना चाह रहा है,
वो शब्द नहीं मिल रहे,
और जो करना चाह रहा है,
वो मौके।

-प्रणव मिश्र

















Thursday, July 13, 2017

वज़न ही तो है।

न जाने ... किस हक़ से,
                लोग मुँह उठा कर,
                मुँह पर comment कर देते हैं, ... 
                weight को लेकर,
"बहुत कमज़ोर लग रहे हो?".. 
               जी में आता है, उसी वक़्त,
                pant में हाथ डालकर अपनी, पकड़ लूँ अपना, 
                और निकाल लूँ , और उठा दूँ,,... 
                अपनी t -shirt का कोना,
                 और दिखा दूँ,.. बारीक़ कटे abs . 
                 पर क्या करूँ,
                 थोड़ा polite nature का हूँ,
                 तो सिर्फ़ ये कह कर आगे बढ़ जाता हूँ.. कि,
                 "I wish, I could say the same to you."
                और कई मौकों पर तो सिर्फ़ मुस्कुरा देता हूँ,
                फिर सोचता हूँ,.. 
                कि ये वज़न तुम्हारा जितना भी है,
                maintain रखो, इसकी ज़रुरत है तुम्हे,
                क्यूँ कि बस यही तो है,
जो तुम्हारी हलकी बातों को balance में रख़ता है। 




-प्रणव मिश्र