Tuesday, January 16, 2018

इस वक़्त भी,कहीं,... आदमी जल रहा है,
एक छोटे से कुएं के बाहर, बहुत कुछ चल रहा है,
किसी का ख़ून सड़कों पे पड़ा है,
किसी का कितनों की आँखों में उबल रहा है। 

और मैं?... 



-मिस्रा 




Friday, December 22, 2017

खिंचते चले आये, जिस्म दोनों,
मुट्ठियाँ बंद रहीं, मुँह ख़ामोश, 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
तो हाँथ भी नहीं रखा दोनों में,
.. किसी ने किसी के ऊपर,
बस,..  एक गर्दन की गर्मी से,
एक गर्दन की नमी सूखती रही। 
वो बैठा रहा बिस्तर पर,
और वो बैठी रही गोद में उसकी,
किसी ने कुछ नहीं करा,
बस,.. एक छाती की रगड़,
एक छाती में जान फूँकती रही।
कलाई ख़ुद-ब-ख़ुद,
खोलती रही, ... मुट्ठी को,
उँगलियाँ कमर में गड़ोई गयीं, 
कि कहीं कुछ पकड़ न लें, और 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
एक नाक सूंघती रही कुछ बालों को दो सूत की दूरी से,
कानों की लौ गरम होती रही,
और वो उसकी पोशाक का एक कोना पकड़े रहा,
जो एक  जांघ से एक जांघ तक,
ज़र्रा - ज़र्रा  फिसलती रही। 
न उतरी, न उतारी गयी,
पर ख़यालों में, एक खाल में ढली खंजर,
ख़यालों में, एक खाल के बहुत अन्दर,
ख़ुद-ब-ख़ुद  उतरती रही। 



-मिस्रा 






Thursday, December 21, 2017

जितनी आसानी से लोग कह देते हैं,
उतनी आसानी से लोग भुला नहीं पाते,

चीखते हैं, चिल्लाते हैं, और लोग चले जाते हैं,
जब चले जाते हैं,...लोग वापस बुला नहीं पाते।







-मिस्रा 

Wednesday, December 20, 2017

सीधे शब्दों में नहीं लिखी जाती ये,.. 
कहानी भी कुछ ऐसी है।
उलझन है भी, और नहीं भी,
परेशानी भी कुछ ऐसी है। 



-मिस्रा 


Monday, December 11, 2017

मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?

इतना अकेला कब तक, रखोगी मुझे,
...ज़िन्दगी।
जो चाहिये, जाने कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
तुम्हारी मौजूदगी में सुकून आएगा... 
ये तसल्ली कब होगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
हर रात मुँह मोड़ लेती हो मुझसे,
कुछ ख़फ़ा- ख़फ़ा रहती हो,
करवट बदल कर 'सब ठीक हो जाएगा'
ये दिलासा कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
पास बैठ कर हाल पूछोगी कब,
पास बैठ कर बात कब करोगी,
जो तक़लीफ़ देता है, वो कब देखोगी,
मेरा मरहम कब बनोगी,
उकता के चली जाती हो जो दूर मुझसे,
कुछ सुनाऊँगा इस बार, 
तो क्या फ़ुर्सत से, सुनोगी मुझे?
... ज़िन्दगी। 
मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?
क्या इस बार पूरा करोगी मुझे,
....ज़िन्दगी?

-मिस्रा 


Monday, November 27, 2017

ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये बेचैनी मुझसे कम क्यूँ नहीं होती,
ये आधी रात के बाद हि क्यूँ जगता है मन,
ये अकेला सा जो महसूस होता है,
ये क्या है?..
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये रात भर यूँ ही तकिये पर,
जो सर रखा रहता है, और कुछ नहीं कहता,
ये क्या है?...

करवट बदलने पर जब तुम्हें नहीं पाता हूँ,
तब बहुत अकेला महसूस करता हूँ,
हाथ रख-रख कर कम्बल को कई बार टटोलता हूँ,
शायद आवाज़ आ जाए,..
"अब सो क्यों नहीं जाते?"

उठ-उठ कर कई बार,
फैंकता रहता हूँ, रज़ाई का दूसरा कोना,
बिस्तर के दूसरी तरफ़ ,
कि याद है, तुम कहती हो
"तुम्हारी खींच तान में, खुले रहते हैं,
और मेरे पैर, पूरे नहीं आते। "

ये जो शायर सा महसूस होता है,
तुम्हारी नामौजूदगी में,
पर शायरी नहीं आती,
ये क्या है?...

ये जो खुली आँखों से,
पँखे पे धूल के निशानों को मिला-मिला कर,
तुम्हारी तस्वीर बनाता रहता हूँ,
पर उसमें से तुम्हारी आवाज़ नहीं आती,
ये क्या है?...

ये क्या है, कि  जब चाहता हूँ,
छू लूँ तुम्हें,
पर तुम पास नहीं होती,
और जब पास होती हो,
तो छू कर भी छू नहीं पाता,
ये क्या है,
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?


-मिस्रा