Tuesday, July 18, 2017

बासमती चावल हो तुम

बस ये समझ लो कुछ देर को,
कि बासमती चावल हो तुम,
pressure cooker में तो जाना पड़ेगा,
अगर तैयार होना है,
(कच्चे कितने दिन गुज़ारोगे, और किसके घर पे,
पड़े पड़े एक दिन घुन लग ही जाएगा )
पर जितना ज़्यादा pressure मिलेगा,
उतना जल्दी पकोगे,
हाँ, .. थोड़ा घुटन होगी,
थोड़ा जलन होगी,
और कुछ नहीं दिखेगा कुछ देर को,
पानी ऊपर उठेगा, तो डर भी लगेगा,
काँपेगा, सर तक डूबा हुआ एक एक अंग,
धुंधला सा हो जाएगा सब कुछ, कुछ पलों को,
और आंच अगर धीमी हुई, तो थोड़ा time भी लग सकता है,
पर जब सीटी आएगी और ढक्कन खुलेगा,
तब तक तुम्हारे अलावा, जो भी हैं इर्द गिर्द,
और जितना भी है इर्द गिर्द,
सब भाप बन के उड़ जाएगा।
क्यूंकि किसी के बाप में नहीं हिम्मत, जो तुममे है,
बस कुछ देर को,
pressure cooker में तो जाना पड़ेगा,
फिर हर तरफ़ खुशबू भी होगी,
और स्वाद भी आएगा,
...ज़िन्दगी का।


-प्रणव मिश्र 






Monday, July 17, 2017

टुकड़ों में


एक लड़का दिखता है,
जब भी बचपन याद करता हूँ,
दुबला सा,
रौंगटे भर बाल आना शुरू हुए हैं गालों पर,
और वो, अपने तिमंज़िले मक़ान की,
छत के पीछे वाले कोने पे बैठ के,
सपनों का parabola नाप रहा है,
कि कितनी दूर जाएंगे,
पीछे मैदान में,
हर एक फेंकी हुई ईंट... 
के टुकड़े से।
फिर, एक लड़का दिखता है,
bike पे अकेला चला जा रहा है,
कुछ मांस भर आया है,
और बाल कुछ बड़े हुए हैं,
और helmet सिर्फ़ इसलिए लगाया है,
क्यूंकि यकीन है,
कि उतारते ही पहचान लेंगे, सब लोग, ... अब से कुछ सालों के बाद,
तो practice बनी रहे,
कि जब वक़्त आये, तो uncomfortable महसूस न हो।
फिर,... एक लड़का है,
जो  ज़्यादा बोलता नहीं है,
बस या तो analyse कर रहा है,
या observe,
क्यूंकि वो जो कहना चाह रहा है,
वो शब्द नहीं मिल रहे,
और जो करना चाह रहा है,
वो मौके।

-प्रणव मिश्र

















Thursday, July 13, 2017

वज़न ही तो है।

न जाने ... किस हक़ से,
                लोग मुँह उठा कर,
                मुँह पर comment कर देते हैं, ... 
                weight को लेकर,
"बहुत कमज़ोर लग रहे हो?".. 
               जी में आता है, उसी वक़्त,
                pant में हाथ डालकर अपनी, पकड़ लूँ अपना, 
                और निकाल लूँ , और उठा दूँ,,... 
                अपनी t -shirt का कोना,
                 और दिखा दूँ,.. बारीक़ कटे abs . 
                 पर क्या करूँ,
                 थोड़ा polite nature का हूँ,
                 तो सिर्फ़ ये कह कर आगे बढ़ जाता हूँ.. कि,
                 "I wish, I could say the same to you."
                और कई मौकों पर तो सिर्फ़ मुस्कुरा देता हूँ,
                फिर सोचता हूँ,.. 
                कि ये वज़न तुम्हारा जितना भी है,
                maintain रखो, इसकी ज़रुरत है तुम्हे,
                क्यूँ कि बस यही तो है,
जो तुम्हारी हलकी बातों को balance में रख़ता है। 




-प्रणव मिश्र 




Monday, July 10, 2017

आख़री ८ (8) लाइनें

(कई सारी mediocre lines भूमिका बांधते हुए,)..  फिर,
" अकेला हूँ"...
..
..
ये लिखना नहीं चाह रहा,
पर उतर आया युहीं देखो,
जो कहना नहीं चाह रहा,
.. और जो कहना चाह रहा हूँ,
   वो शब्द नहीं मिल रहे,
   और जो करना चाह  रहा हूँ,
वो मौके।


-प्रणव मिश्र 

Saturday, July 8, 2017

बाकी तो सब बातें हैं।


आदमी के,
taste का पता, 
क्या बेच रहे हैं,
से ज़्यादा कैसे बेच रहे हैं,
से लगता है। 
....
भीड़ के सामने,
सब glass रख कर नाच ही रहे हैं,
बेचने वाले भी नाच रहे हैं,
खरीदने वाले भी नाच रहे हैं,
बस glass उठाते ही,
नाचने से परहेज़ सबको है।

if you know, what I mean.


-प्रणव मिश्र


Thursday, July 6, 2017

हर रात।

कई बार कुछ नहीं आता ज़हन में,
क़िताब लेकर,
उसके किन्हीं दो पन्नों के बीच में diary फंसा कर,
सारी रात बैठता हूँ,
१ बजता है... 
२ बजता है.. 
३ बजता है,
पेशाब करता हूँ,
balcony पर जाकर सामने parking में,
झाँक कर देखता हूँ, गाडी खड़ी है या नहीं,
रोज़ खड़ी मिलती है,
फिर.. 
४ बजता है,
फिर bathroom में जाकर शीशे में,
अपनी शक्ल देखता  हूँ... 
तब तक ५ बज जाता है, 
और बेमन सोता हूँ, 
अमूमन हर रात। 



-प्रणव मिश्र 







आज क्या हिलाया?

जानवर हो य इन्सान,
आख़िर में,
सब हिला ही रहे हैं.... 



.... कुछ न कुछ। 




-प्रणव मिश्र