Monday, December 11, 2017

मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?

इतना अकेला कब तक, रखोगी मुझे,
...ज़िन्दगी।
जो चाहिये, जाने कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
तुम्हारी मौजूदगी में सुकून आएगा... 
ये तसल्ली कब होगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
हर रात मुँह मोड़ लेती हो मुझसे,
कुछ ख़फ़ा- ख़फ़ा रहती हो,
करवट बदल कर 'सब ठीक हो जाएगा'
ये दिलासा कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
पास बैठ कर हाल पूछोगी कब,
पास बैठ कर बात कब करोगी,
जो तक़लीफ़ देता है, वो कब देखोगी,
मेरा मरहम कब बनोगी,
उकता के चली जाती हो जो दूर मुझसे,
कुछ सुनाऊँगा इस बार, 
तो क्या फ़ुर्सत से, सुनोगी मुझे?
... ज़िन्दगी। 
मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?
क्या इस बार पूरा करोगी मुझे,
....ज़िन्दगी?

-मिस्रा 


Monday, November 27, 2017

ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये बेचैनी मुझसे कम क्यूँ नहीं होती,
ये आधी रात के बाद हि क्यूँ जगता है मन,
ये अकेला सा जो महसूस होता है,
ये क्या है?..
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये रात भर यूँ ही तकिये पर,
जो सर रखा रहता है, और कुछ नहीं कहता,
ये क्या है?...

करवट बदलने पर जब तुम्हें नहीं पाता हूँ,
तब बहुत अकेला महसूस करता हूँ,
हाथ रख-रख कर कम्बल को कई बार टटोलता हूँ,
शायद आवाज़ आ जाए,..
"अब सो क्यों नहीं जाते?"

उठ-उठ कर कई बार,
फैंकता रहता हूँ, रज़ाई का दूसरा कोना,
बिस्तर के दूसरी तरफ़ ,
कि याद है, तुम कहती हो
"तुम्हारी खींच तान में, खुले रहते हैं,
और मेरे पैर, पूरे नहीं आते। "

ये जो शायर सा महसूस होता है,
तुम्हारी नामौजूदगी में,
पर शायरी नहीं आती,
ये क्या है?...

ये जो खुली आँखों से,
पँखे पे धूल के निशानों को मिला-मिला कर,
तुम्हारी तस्वीर बनाता रहता हूँ,
पर उसमें से तुम्हारी आवाज़ नहीं आती,
ये क्या है?...

ये क्या है, कि  जब चाहता हूँ,
छू लूँ तुम्हें,
पर तुम पास नहीं होती,
और जब पास होती हो,
तो छू कर भी छू नहीं पाता,
ये क्या है,
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?


-मिस्रा



Tuesday, November 21, 2017

बात जो होनी थी, नहीं हुई...

बात जो कभी कही नहीं,
शुरू वहां से हुई,
पर, जो भी कहा गया उस शाम,
हर बात ख़त्म हो गयी। 
शिकायतें मुँह तक आयीं,
पर हलक़ से गालियां निकलीं,
उनके रिश्ते के मैल की,
आँखों से नालियां निकलीं... 
वो चीखता रहा,
वो चीखती रही,
वो देखता रहा,
वो देखती रही,
वो भीगता रहा,
वो भीगती रही,
फिर कुछ यूँ उठी,गयी,
कि मुलाक़ात ख़त्म हो गयी,
जो भी कहा गया उस शाम,
हर बात ख़त्म हो गयी। 
गुस्से का क्या करूँ बयान,
चीज़ें टूटनी थीं,.. तोड़ी गयीं,
cup फूटने थे,... फोड़े गए,
एक नए perfume की bottle भी मारी गयी,
कुछ बेहिसाब सिक्के भी फेंके गए,
हर वो चीज़ गिरी, गिरायी गयी,
जो आवाज़ करे,
बस बात ही थी,
वही हुई,
जो बदहवास करे,
उसको देखा मैंने जाते हुए,
फिर चिड़चिड़ाहट हुई,
दो बातों में तौल दिया,
प्यार, जो सालों चला,
और सिर्फ़ दो बातों से,
उनका हर दिन,
उनकी हर शाम,
और शाम की आज,
देखो हर रात ख़त्म हो गयी,
कुछ ऐसा कहा गया उस शाम,
कि हर बात ख़त्म हो गयी। 

-मिस्रा 





Saturday, November 4, 2017

behave करना कैसे था।

सीधे शब्दों में कहूँ, 
तो, अब भूल चूका हूँ,
behave,..  
करना कैसे था। 
साथ जीना कैसा था, 
बग़ैर, मरना कैसे था। 
तुम्हारी किस बात पे हसना था,
तुम्हारी किस बात पे रोना था,
तुम्हरे संग...  इतना दूर चलना था,
कितना दूर चलता था ?...
तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाना कैसे था,
जज़्बात पढ़ना था, नहीं पढ़ना था?
तुम्हरी ख़ामोशी से बात,
करते रहना कैसे था,
साथ जीना कैसा था, 
बग़ैर, मरना कैसे था।
भूल चूका हूँ,
इश्क़ करना कैसे था,
सब उसके लिए करना था,
या ख़ुद के लिए करना था,
प्यार "नहीं"
जज़्बात "नहीं"
sex "नहीं,.. ok maybe"
मुलाकात "नहीं"
बात "नहीं"
कोई बात नहीं। .. 
कहके आगे बढ़ना कैसा था ?
भूल चूका हूँ,
तुम्हारी मौजूदगी,
और भूल चूका हूँ,
बग़ैर तुम्हारे,
रातो को नहीं ..डरना कैसे था? 

साथ जीना कैसा था, 
बग़ैर, मरना कैसे था। 


-प्रणव मिश्र 








Thursday, November 2, 2017

एक अँधेरे कमरे की,
सफ़ेद सिलवटों में,
गुस्ताखियाँ... कर रहा था वो,
और कई कोसों दूर से,
कर रही थी वो भी... 
कुछ,
गुस्ताखियाँ । 
एक तस्वीर देखते,
और परखते देर तक उसको,
वो शैतान था... 
ये सब जानते थे,
पर आज कई कोसों दूर से,
कर रही थी वो भी... 
कुछ,
गुस्ताखियाँ ।


- प्रणव मिश्र 


Pranav Mishra - poem -neend