Thursday, August 16, 2018

एक चिता की आग में, कई जानें जल गयीं।
एक पिता जल गया,
एक पत्नी जल गयी,
एक पति जल गया,
उनका छोटा सा एक घर जल गया,
चिंगारी उड़ी,...
तो एक माँ और दो बेटों ने भी आग पकड़ ली,
अब वो तीनों,..
..
उम्र भर जलते रहेंगे।



-मिस्रा 

Saturday, August 11, 2018

.. अकेला

ये सारी कहानी अकेली है।
         कभी अकेलेपन से,
                 कभी मन से।
ये जितना छुपा रहा हूँ,
उतना damage हो रहा हूँ,
जितना बताता हूँ,... उतना नंगा।
फिर guilt मारती है।

कुछ देर को भूल जाता हूँ वजूद अपना,
कुछ दूर बहा ले जाती है वो,
फिर,.. हाथ फिसलता है,
(हमेशा होता है)
जो मैं दोबारा नहीं पकड़ता,
और तैरा करता हूँ,
... अकेला।


-मिस्रा





Friday, August 10, 2018

cognitive problem

मेरी तरफ़ देखते- देखते उसकी आंखें सूखती गयीं,
बड़ी होती गयीं,
और मैं...  और छोटा। 
इतना छोटा, और कितना असाहय,
कितना अकेला। 
कितना कुछ है कहने को उससे,
पर वो अब सुनता नहीं,
बस एक टक देखता रहता है,
कभी-कभी कुछ बोलता है, तो ख़यालों का.. 
.... न सर होता है, न पैर। 

कुछ समझ नहीं आया,
क्या हुआ? ... कैसे हुआ?
सब कहते रहे, "कितने मज़बूत हो तुम, ... कितने कारगर"
मैं सुनता रहा और खुद पर अनजाने शायद फ़क्र करता रहा। 
आज लिख रहा हूँ, तो बहुत शर्म आती है ख़ुद पर,
उधर कोई कराह रहा है,
और इधर मैं बस लिख रहा हूँ कि वो कराह रहा है,
कितना छोटा हूँ मैं। 
पर bukowski सही कहता था,
"Poetry is what happens when nothing else can"

कुछ नहीं कर पाया मैं। 



-मिस्रा 








 

Friday, July 27, 2018

सिर्फ़ सोने से डरता हूँ मैं।

कभी कभी सिर्फ़
भरोसा करने से डरता हूँ मैं,
पानी सामने होता है,
शायद साफ़,
पर तैरने से डरता  हूँ मैं,
...
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उसको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था,
मेरे सामने लेटी रहती थी, बिन धागों के,
मेरी उंगलियां रेंगती रहती थीं,
जब उसके boyfriend का phone आता था,
तो कितना रोती थी,
चीखती थी, चिल्लाती थी,
एक हाँथ से handset को पकड़े, बातें करती रहती,
और दुसरे से अपनी कसी मुट्ठी में मुझे दबाये,
अपने मौजूद होने का एहसास दिलाती,
इधर मेरा शरीर ढीला पड़ जाता,.. उसकी कलाई की रफ़्तार से,
और उधर उनका सुलह हो जाता।
फिर,
घर आते वक़्त,
बहुत बुरा लगता उस लड़के के लिए,
जो हज़ार माफियां मांगता उससे phone पर पहले,
और फिर सो जाता होगा।
.....

कैसे नंगी लेटी रहती थी, मेरे सामने,
कमर के पास कैसे उठता गिरता था मांस उसका,
कैसे अपनी छाती पर मेरा हाथ रख कर रगड़ती थी,
अपने होठों से क्या-क्या तो नहीं पकड़ती थी,
कैसे निगल लेती थी,
... हर एक बात,
कैसे एक- दो चेहरे पर पड़ी बूंदों को,...
ज़बान से ठेल -ठेल कर मुँह तक पहुंचती अपने,
मैं यहां ताका करता,
और वो वहां सो जाता होगा।

कभी-कभी सिर्फ,
भरोसा करने से डरता हूँ मैं,
मक़ान सामने दिखता है,
तो ठहर जाता हूँ,
और आगे चलने से डरता हूँ मैं,


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वो कैसे मेरे कमरे में बेपर्दा होती थी,
कैसी कैसी नज़रों से देखती थी,
शादीशुदा थी,
और अपने बेटे,घर, परिवार से बहुत प्यार करती थी,
मुझसे कहती थी,
कुछ पूछना मत, कुछ कहना मत,
करना बहुत कुछ,
फिर कुछ करना मत,


कैसे रेंगती थी, मेरे पास आने पर,
कैसे थिरकती थी मेरे छूने पर,
कैसे मेरे बालों को कस कर पकड़ती थी,
जब उसकी और मेरी कमर के ठीक नीचे,
सारी दूरियां मिट जाती थीं।
उधर वो इंतज़ार करता रहता होगा घर पर,
और फिर सो जाता होगा ,

कभी-कभी सिर्फ़ ,
भरोसा करने से डरता हूँ मैं,
सपना नज़दीक होता है,
पर आँख खुल जाती है,
और दोबारा आँख बंद करने से डरता हूँ मैं,


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वो दोनों,
साथ रहते थे,
वो american थी,
और वो न जाने क्या था,
एक project के सिलसिले में
पहली बार मिले थे ,
जब भी वो शहर में नहीं होता था,
मुझे घर पर बुलाती थी,
दरवाज़ा खोलती थी,
तो बत्तियां बंद होती थीं,
कपड़े बदन को छोड़ कर,
सोफों पे पड़े रहते थे,
कितने बेशर्म थे?
मेरी कमर और बेल्ट के बीच। ..
न जाने कैसे अपनी चार उँगलियाँ फंसा कर,
buckle को अपने अंगूठे दबाये,
दुसरे कमरे  लेकर जाती थी,
कहती थी,
वो  ऊपर वाला कमरा,
... उसका है,
और वहां उनका एक छोटा सा घर है,
जो बहुत साफ़ है,
यहां नीचे रहेंगे रात भर,
तुम जो भी कहोगे वही पहनूंगी,
फिर तुम धीरे-धीरे रात भर उतरना,
जो भी करना है,
यहीं नीचे करेंगे रात भर,

एक रात अँधेरा ज़्यादा था,
कुछ नहीं दिख रहा था,
नहीं दिख रहा था मुझको जब वो मेरी गोद में थी,
नंगी।
नहीं दिख रहा था उसको,
जब मैं उसको हांथों में लिए सीढ़ियां चढ़ रहा था,
नहीं चुभ रहे थे दांत उसके,
कानों में मेरे ,
नहीं सम्भल रहा था वज़न उसका,
फिसलन थी,
और पसीना जो बह रहा था,
तो एक ही कमरा जो साफ़ था,
पूरे घर में,
दाग उसमें भी पड़ गए थे,
रात भर पसीना बहने से।

उधर वो ticket खरीद रहा होगा,
और लम्बे सफ़र में घर लौटते वक़्त,
थक कर सो जाता होगा।


कभी-कभी अब किसी भी रिश्ते में,
सिर्फ़ सोने से डरता हूँ मैं।



-मिस्रा
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       







Tuesday, July 24, 2018

"सब ठीक हो जाएगा।"

"थोड़ी देर और,
फिर सब ठीक हो जाएगा ..."
कहना भी ज़रूरी था,
सो कह दिया। 
और वो मुझे कितनी हि देर,.. 
बिना झपकी पलकों से देखता रहा, 
एक टक। 
.. मैं हँसता रहा,
इधर-उधर की बातें करता रहा। 
फिर "सब ठीक हो जाएगा।" 
... वो यही सोच कर,
एक रात और सो गया... 



- मिस्रा 






Tuesday, July 17, 2018

अभी तो वक़्त भी नहीं हुआ,
अभी से क्यों कह दूँ ?... 
.. कि रात है।

अभी से क्यों डरूं ?

अभी से क्यों जलाऊं ?.. 
.. रूह मैं। 
अभी तो दिख रही है ज़िन्दगी। 

अभी से क्यों मरुँ ?



- मिस्रा 

 



Friday, July 13, 2018

क्या मुलाक़ात थी वो

तुम्हें कुछ दूर से देखना था,
 उस रात, छुप कर उन्हें,..
दो लोग street lights के नीचे कहीं चले जा रहे थे।
लड़के ने काली पैंट पहनी थी,
सफ़ेद शर्ट पे नीली धारियां,
काले जूते, और एक घड़ी जो भी काली थी,..
(उस रात नहीं देखी गयी)

उस लड़की को उस रात,
उस लड़के की नज़र से देखना था तुम्हें,

दायीं तरफ़ आँख के उसके,
एक पीली dress का टुकड़ा था,
जो बार-बार आँखों के सामने तक,
उड़ता-उड़ता आता, मुस्कुराता,
और उसको follow करते करते,
नज़र उसकी नज़र से मिल जाती, हर बार,
होठ मुस्कुराते और वो चलते जाते।

तुम्हें छुप कर देखना था उन्हें उस रात,...
.. बगल से निकलती हुई गाड़ियों के शीशों के पीछे से,
लड़के के कन्धे पीछे थे,
और पैर नाप के पड़ रहे थे, हर बार ,
और लड़की बेपरवाह।
पर नहीं,..

.. उस लड़की को उस रात,
उस लड़के की नज़र से ही देखना था तुम्हें।

कैसे मुस्कुरा रही थी,
और बोलते वक़्त उसके होठ कैसे हिल रहे थे,
कैसे "रास्ता, साथ,समां" जैसे शब्द कहते वक़्त,
मुँह में मौजूद लार की वजह से....
... लफ्ज़ फिसल-फिसल कर निकल रहे थे।
उसका 'सा' हि इतना पूरा था,
कि और कोई नोट सुनाई ही नहीं दे रहा था,
वो कुछ कहती, तो बाकी के सुर वो लगाता, हर बार,
और वो चलते जाते।

कुछ दूर से देखना था तुम्हें, उन्हें उस रात,
पास की इमारत की सत्रवीं मंज़िल की खिड़कियों के पीछे से,
कैसे उड़ रहे थे बाल उसके,
हर बाल अलग tempo  में, फिर भी लयबद्ध,
कितने ख़ूबसूरत थे।
कैसे हर बार चलते-चलते,
वो ख़ुद पास आ जाते,
उंगलियां टकरातीं,
वो मुस्कुराती,
और लड़का मन ही मन तमाम कहानियां बनाता।
(उसकी आखों में दिख रहा था)
उसको लगता था कि वो कहानीकार है,
पर आज अपनी कहानी,
ख़ुद ही नहीं लिख पा रहा था।

लड़का 5'11" था, लड़की कुछ 5'8",

पर लड़की को तुम्हें उस लड़के की नज़र से ही देखना था उस रात।

कितना सुकून था, और दिल कितना बहल रहा था ,
वक़्त ठहर सा गया था,
और रास्ता ठहर ही नहीं रहा था ,
कितना कुछ महसूस हो रहा था,
कितना कुछ हो रहा था,
कितनी बड़ी आँखें थीं उसकी,
कि सब कुछ वो ही देख पा रही थी शायद,
लड़के को तो सिवाय उसके कुछ दिख ही नहीं रहा था।

कैसी रात थी वो, तुम्हें देखना था,
कुछ दूरी से छुप कर उन्हें,
कुछ तो बात थी, तुम्हें देखना था,
कुछ दूरी से छुप कर उन्हें,
कितने मशगूल थे वो दोनों,
कितने आज़ाद थे एक साथ,
क्या मुलाक़ात थी वो, तुम्हें देखना था,
कुछ दूरी से छुप कर उन्हें।



-मिस्रा