Saturday, February 3, 2018

एक लम्हा सा कैद है ...

एक लम्हा सा कैद है,
जिसमे तुम अब एक ख़याल हो,
... और ज़िन्दगी है,
और कितना ज़िंदा हूँ मैं,
और कितनी ज़िंदा हो तुम,
कितनी ख़ामोशी है,
पर कितना कुछ कह रहा हूँ मैं,
और कितना कुछ कह रही हो तुम।
कितनी मासूम हो तुम,
कितना खोया हूँ मैं,
कितनी कम दूरी है,
तुम्हारे कितने पास सोया हूँ मैं,
किस तरह से लिखूं ,
कि किस तरह से देख रही हो तुम,
और किस तरह से तुम्हें देख रहा हूँ मैं।
तुम एक ख़याल हो,
उस लम्हें का,
अब जिसे भूल चुकी हो तुम,
अब जिसे भोग रहा हूँ मैं।


-मिस्रा







Thursday, February 1, 2018

एक शर्म के पीछे।

सबके गले सूखे हैं,
सबकी नसों में आग है,
सबकी लार घुट रही है
एक शर्म के पीछे।
एक शर्म के पीछे,
बस एक ही दीवार है,
न तोड़ पा रहा है कोई,
न छुप हि पा रहा है।
और सभी तो नंगे हैं,
और सभी तो भूखे है,
और सभी तो छूते हैं,
खुदको...
एक शर्म के पीछे।

एक शर्म के पीछे ही जो है,
वो इंसान है,
बाकी तो सिर्फ़ कपड़े हैं,
हया है, डर है, और संकोच,
सबकी आँखें झूठी हैं,
सबकी नाभि प्यासी है,
सबकी हवस घुट रही है,
एक शर्म के पीछे।


-मिस्रा 

Tuesday, January 16, 2018

इस वक़्त भी,कहीं,... आदमी जल रहा है,
एक छोटे से कुएं के बाहर, बहुत कुछ चल रहा है,
किसी का ख़ून सड़कों पे पड़ा है,
किसी का कितनों की आँखों में उबल रहा है। 

और मैं?... 



-मिस्रा 




Friday, December 22, 2017

खिंचते चले आये, जिस्म दोनों,
मुट्ठियाँ बंद रहीं, मुँह ख़ामोश, 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
तो हाँथ भी नहीं रखा दोनों में,
.. किसी ने किसी के ऊपर,
बस,..  एक गर्दन की गर्मी से,
एक गर्दन की नमी सूखती रही। 
वो बैठा रहा बिस्तर पर,
और वो बैठी रही गोद में उसकी,
किसी ने कुछ नहीं करा,
बस,.. एक छाती की रगड़,
एक छाती में जान फूँकती रही।
कलाई ख़ुद-ब-ख़ुद,
खोलती रही, ... मुट्ठी को,
उँगलियाँ कमर में गड़ोई गयीं, 
कि कहीं कुछ पकड़ न लें, और 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
एक नाक सूंघती रही कुछ बालों को दो सूत की दूरी से,
कानों की लौ गरम होती रही,
और वो उसकी पोशाक का एक कोना पकड़े रहा,
जो एक  जांघ से एक जांघ तक,
ज़र्रा - ज़र्रा  फिसलती रही। 
न उतरी, न उतारी गयी,
पर ख़यालों में, एक खाल में ढली खंजर,
ख़यालों में, एक खाल के बहुत अन्दर,
ख़ुद-ब-ख़ुद  उतरती रही। 



-मिस्रा 






Thursday, December 21, 2017

जितनी आसानी से लोग कह देते हैं,
उतनी आसानी से लोग भुला नहीं पाते,

चीखते हैं, चिल्लाते हैं, और लोग चले जाते हैं,
जब चले जाते हैं,...लोग वापस बुला नहीं पाते।







-मिस्रा 

Wednesday, December 20, 2017

सीधे शब्दों में नहीं लिखी जाती ये,.. 
कहानी भी कुछ ऐसी है।
उलझन है भी, और नहीं भी,
परेशानी भी कुछ ऐसी है। 



-मिस्रा 


Monday, December 11, 2017

मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?

इतना अकेला कब तक, रखोगी मुझे,
...ज़िन्दगी।
जो चाहिये, जाने कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
तुम्हारी मौजूदगी में सुकून आएगा... 
ये तसल्ली कब होगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
हर रात मुँह मोड़ लेती हो मुझसे,
कुछ ख़फ़ा- ख़फ़ा रहती हो,
करवट बदल कर 'सब ठीक हो जाएगा'
ये दिलासा कब दोगी मुझे,
... ज़िन्दगी। 
पास बैठ कर हाल पूछोगी कब,
पास बैठ कर बात कब करोगी,
जो तक़लीफ़ देता है, वो कब देखोगी,
मेरा मरहम कब बनोगी,
उकता के चली जाती हो जो दूर मुझसे,
कुछ सुनाऊँगा इस बार, 
तो क्या फ़ुर्सत से, सुनोगी मुझे?
... ज़िन्दगी। 
मेरे 'मिसरे' को पढ़ोगी क्या?
क्या इस बार पूरा करोगी मुझे,
....ज़िन्दगी?

-मिस्रा