Monday, April 29, 2013

यह शब्दों का देश है।

यह शब्दों का देश है।

जहाँ पेट ख़ाली और ज़बानें लम्बी हैं,
तीर हैं कम पर क़मानें लम्बी हैं।

यह शब्दों का देश है ...

लोग चीखते रहे, दर्द बहता रहा,
अधरों से निकले शब्द में,
मैं अधर था, रहा।

पर हिन्द है मेरा यह, और मुझे इससे प्यार है।

तो क्या हुआ कि कुछ कपड़े फट गए,
पर दुकाने लम्बी हैं।

जहाँ पेट हैं खाली और ज़बाने लम्बी हैं।

यह शब्दों का देश है ...

दो, चार कदम मैं चला,
पर कदम तुम दो ही चल पाओगे,
अपने ही लुटेरों को पति बनाओ,
वर्ना पतिता कहलाओगे,

यही न्याय है, और यही धर्म है यहाँ,
जहाँ सुहाग हैं छोटे, पर मांगें लम्बी हैं।

यह शब्दों का देश है।

जहाँ पेट ख़ाली और ज़बानें लम्बी हैं,
तीर हैं कम पर क़मानें लम्बी हैं।

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