Friday, May 3, 2013

Antique

जहाँ पर मैं बैठा हूँ, एक दरवाज़ा है मेरे ठीक  सामने___

बरसों पड़ा रहा छत पर,
कुंडी भी थी, और सिटकनी भी, थी ___
फ़िर भी बारिश को सहता रहा,
धूप, बयार, पतझड़,
और कभी कभी तो घायल पक्षियों का खून भी बहता रहा,
इसके तन पर___

कभी किसी बच्चे की गेंद आ जाती थी,
तो दोनों हर टप्प के साथ कितनी ही देर तक हाँथ मिलाते थे,
और कभी-कभी तो बंद्दर भी खेलते थे उस पर,

यह नहीं कि दरवाज़ा बंद कर लेता___

ख़ैर,

जहाँ पर मैं बैठा हूँ आज, एक दरवाज़ा है मेरे ठीक सामने___

हम जब आए थे यहाँ,
तब पिछले किराएदार न जाने क्यूँ,
अपना दरवाज़ा खोल ले गए थे,
हम उसी रोज़ छत पर से ले आए थे,
यह बीमारी का गठ्हर ,

दरारें पड़ गयीं थीं,
और  बेरंग भी था वो,
पर मैंने और शायमा ने टाँग दिया उसे,
जैसा था वैसा,  अपने दफ़्तर की दीवार पर___

और आज लोग उसे Antique कहते हैं।

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