Wednesday, May 1, 2013

मैं नारी हूँ, नाव नहीं।

इक अँधेरे कक्ष में, मेरे बिलखते वक्ष में
यह श्वेत नीर चिल्लाता है

मैं नारी हूँ नाव नहीं।

मैं नारी ही हूँ नाव नहीं,
क्यूँ ऐसा तुझमें भाव नहीं?

मैं नारी हूँ नाव नहीं।

है दोष मेरा बस इतना,
तुझमें दूध मेरा बहता है
जिस पौधे को मैं सींचूंगी
वह नौ महिने कहता है,

वो जो शब्द हैं कहीं लिखे नहीं,
जो राग हैं मुझको दिखे नहीं,
पर शब्दों का क्या
मेरा मन तेरे जीवन की
हर एक कथा को गाता है,

मैं नारी हूँ नाव नहीं।

एक आवारा कुत्ता भी यह
बात समझ ही जाता है।

मैं नारी हूँ नाव नहीं।

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