Tuesday, May 14, 2013

कुछ कपड़े बदल गए हैं।

स्टेशन की तरफ बढ़ते क़दम,
हाथ में इक बैग,
बैग में कुछ कपड़े,
और उन्ही कपड़ो के रेशों में ऐसा उलझा,
कि पिछली गली में, मैं अपने निशान छोड़ आया,
अपने पीछे मैं अपना जहान छोड़ आया।

काफ़ी अँधेरा था,
ओस की बूँदें, माँ के आंसुओं को बराबर टक्कर दे रही थीं,
पापा चुप थे, और आंसुओं को रोके बस चलते रहे,
मैं ठीक उन्ही के पीछे था।
फ़िर गाड़ी आई, सुबह अभी भी न हुई थी,
भाई वहीँ से लौट गया,
दूर तक बस हाथ हिलाता रहा हवा में,
पर,
हवा थी कम, और लोग थे ज्यादा,
और उसी स्टेशन की भीड़ में,
मैं वो नादान छोड़ आया,
अपने पीछे मैं अपना जहान छोड़ आया।

फ़िर तो कई दिन आये,
कई रातें,
फ़ोन पे ही होती रहीं,
सालों तक बातें,
हर एक बार, हर एक बात में
एक ही सवाल था,

"बेटा, फ़ोन ही आता है, कभी तुम नहीं आते,

आओ तो दिखाऊँ तुम्हें,
lawn में पौधे कुछ और भी लगाए हैं,
कुछ खिलते हैं,
कुछ खुश होते हैं,
और कुछ बात भी करते हैं,
कुछ पूंछते भी हैं, तुम्हारे बारे में,

तो क्या कहूं?"

मैंने कहा कह देना कि,
मैं भूला नहीं हूँ उन्हें, और न हि वो दिन,
जब मैं उन्ही के बीच में,
अपना बाग़बान छोड़ आया,
अपने पीछे मैं अपना जहान छोड़ आया।

आज,
अचानक हि कमरे के कोने में रखे,
उस बैग पर नज़र गयी,
खोला! तो जाना,
कि बैग तो वही है, जो लेकर चला था मैं बरसों पहले,
बस कुछ कपड़े बदल गए हैं।

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