Wednesday, August 28, 2013

Mumbai की इमारतें

ये मुम्बई की इमारतें भी मुझसे हर बार कुछ कहती हैं 
कभी पाँचवीं मंन्जिल के परदों के पीछे छुप के हंसती हैं
तो कभी बारिश की हर बूँद के साथ अपने आँसुअों को धोती हैं ।
ये मुम्बई की इमारतें भी जो हैं न 
वो हर बार मुझसे कुछ कहती हैं

कभी रास्तों को दूर तक ताकती रहती हैं
तो कभी मुड़ कर मुझे देखते ही
खिड़कियाँ बंद कर लेती हैं
कभी अपनी चमड़ी पर पड़े पेन्ट को देख़ शर्माती हैं
अरे मोहतरमा इतना क्यूँ लजाती हैं?

बारिशें क्या कम हैं जो अब आप भी सताती हैं?







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