Sunday, September 8, 2013

उम्र का क्या है,उसे बढने दो।

केक पर लगी मोमबत्ती,  बहुत देर से मेरी ऒर देख़े जा रही थी
कुछ उदास सी थी,
कुछ आंसू  थे जो हवा के ज़ोर से लौ हिलने पर बह निकले थे
कुछ ज़ख्म थे, जो मोम के पिघलने से जहाँ भर निकले थे,
वहीँ दुसरे ज़ख्म दिखाई दे रहे थे

आज मैं था, वो मोमबत्ती थी,
कुछ हाँथ थे और ढेर सा  शोर था

जश्न ज्यों ज्यों बढ़ रहा था,
मैं त्यों त्यों कम हो रहा था।

न जाने ख़ुशी किस चीज़ की थी,
न जाने इतनी मुस्कुराहटों ने  क्यूँ घेरा था,


आज मैं था, वो मोमबत्ती थी,
कुछ हाँथ थे और ढेर सा  शोर था,
एक दर्द भी था,
जो शायद उस मोम की तरह,
जब कोई  नहीं देखता था, तो सीने की नीचली मंज़िल पर जा कर बैठ जाता था,
जहाँ सीलन है,
दीवारें खुर्दुरी हो चुकी है,
और हवा बची नहीं है,
बस, कुछ सांसें हैं, जो चल रही हैं,

न जाने आज नया क्या था,

न जाने ख़ुशी किस चीज़ की थी,
न जाने इतनी मुस्कुराहटों ने  क्यूँ घेरा था,
न जाने केक क्यूँ बट रहा था
न जाने सबके हांथों में एक ग्लास क्यूँ था,
न जाने इतने हाँथ क्यूँ थे,
न जाने वो बस साल के एक इस ही दिन क्यूँ दिखते थे,
न जाने वो लौ जब बुझ रही थी, तब कोई कुछ क्यूँ नहीं कर रहा था,


आज मैं था, वो मोमबत्ती थी,
कुछ हाँथ थे और ढेर सा  शोर था,
एक धुंआ भी था,
जो शायद उस दर्द की तरह,
जब कोई नहीं देखता था, तो उन आंसुओ के साथ ही सूख जाता था,

ढेर सारा शोर, ढेर सारे लोग,
कुछ मोमबत्तियाँ और  थोड़ा सा मैं,
थोड़ा सा वक़्त अभी और भी है,
ये ताली न बजाओ,
इतना शोर न करो,
उम्र को तन्हा छोड़ दो,

मुझे सुकून में कम होने दो,
और उम्र का क्या है,उसे बढने दो।


 उम्र का क्या है,उसे बढने दो।
















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