Sunday, September 22, 2013

एक नयी तश्तरी की आस में।

सीने की तपिश में कुछ भुने हुए ख़यालों ने
आज तश्तरी में इक और नज़्म परोस दी,

बेशक नज़्म ताज़ी थी,
पर ख़याल पुराने थे और जल चुके थे,
कुछ ख़याल जो लखनऊ की गलियों में बोए थे,
कुछ जो छत पर सूखने को कपड़े पड़े थे,
उनसे लिपट कर रात भर रोए थे,

कुछ गाँव की मिटटी से सने थे,
जो 'पटिया' के ट्यूबवेल में धोए थे,

कुछ हवा के तेज़ रुख़ से डरते हुए
मेरे सिरहाने कितनी ही रातों से सोए हुए थे,

कुछ तीखे थे और नज़्म में डाले नहीं थे,
उन्ही मसालों के साथ डिब्बों में भर के रख दिए थे,
कुछ non veg. भी थे
और नज़्म में पर्हेज़ करके
इस्तमाल से दूर रखे गए थे,


बेशक नज़्म ताज़ी थी,
पर ख़याल पुराने थे और जल चुके थे,
कुछ इतने दिन से साथ रखे हुए थे ,
कि न जाने किन ख्यालों को किन ख्यालों के बच्चे हुए थे,
जो फुर्तीले थे वो कूद कर तश्तरी में आ गिरे थे,
और बाकी शायद आलस में किसी कोने में
पड़े थे,
कुछ पुराने बचे ख्यालों के साथ,
एक नए दिन की तलाश में
एक नयी तश्तरी की आस में।













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