Thursday, October 17, 2013

वो दो बकरे

घर के नीचे,
आज पार्किंग में,
दो बकरे बंधे हुए थे,

एक कुछ काला था,
दूसरा कुछ ज़्यादा ही काला था,
जो ज्यादा ही काला था,
उसके दायीं ओर कान पे एक सफ़ेद दाग़ था,
जिसपे सीढ़ियों से छनके चाँदनी  पड़ रही थी,
और वो रौशन था,
सीढियां ठीक उसी के बगल से हो कर गयीं थी,
तो मेरा उनसे मुख़ातिब होना भी ,
लाज़मी था।

मैं पास जा कर खड़ा हो गया,
तभी सायरा अपनी persian बिल्ली को लाकर बोली,
"uncle, हम कल इनकी क़ुर्बानी देंगे,"
(हाँ अब हकीक़त यही है, कि गली के कुछ बच्चे मुझे uncle बुलाते हैं। )

ख़ैर.…
मैंने कहा "hmm.."
फिर उसने ज़मीन पर पड़ी घास को अपने हांथों में उठाया,
और मुझे देख़ कर बोली,
"आप खिलाओगे इन्हें?"
मैंने कहा "hmm.."
फिर दो सांसें लीं,
बकरों ने मुझे देखा,
और पता नहीं क्यूँ  मैंने कहा "तुम खिलादो"
और  चल दिया,

फिर रात भर,
नींद में आते रहे बकरे,
parking के उस तरफ़, चिल्लाते रहे बकरे,
सायरा भी सो चुकी थी, और persian भी,
फिर छत पे जब टंकी भरी,तो टपकते हुए पानी में सुबह तक नहाते रहे बकरे,
वो दो बकरे,

फिर सब खामोश हो गया,


कुछ घास पड़ी है आज भी वहां,
जो तिनका तिनका मेरे पहिये पे सवार हो,
कभी उसकी कभी रोड की दरारें भरती है।
,

सीढ़ियों से छन के चांदनी आज भी गिरती है वहां,
जहाँ अब सिर्फ ख़ामोशी रौशन है,

और ऊपर चढ़ते वक़्त याद आते हैं,
वो दो बकरे। 















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