Saturday, October 26, 2013

"एक रुपया!"

उस चौराहे पर,
एक हाथ है,
जो हर बार,
मेरी car,
के शीशे पे, दस्तक देता है,
चाहे सुबह हो,
या रात,
वो आँखें सोती नहीं हैं,
बस कुछ देर बंद होती हैं,
शायद। 
बड़ा हैरान हूँ,
एक साल से,
ये देख़ कर मैं,
पैर चलते हैं उसके,
पर वो चलता नहीं है,
वहीँ रहता है,
हर एक बार,
वो हाथ,
मेरी car,
के शीशे पे दस्तक देता है। 
आज,
खिड़की खोली मैंने,
तो वो तस्वीर,
जो रोज़ मुरझाए हुए पत्तों की तरह,
कई टुकड़ों में,
मेरे कांच पर गिरती थी,
बोली मुझसे,
"एक रुपया!"
मैंने कहा "क्या करोगे?"
उसने नीचे झुका कर सर,
अपने दाएं पांव की नुची एड़ियों को 
अपने बाएं पांव के अंगूठे के,
नुचे हुए नाखून से खरोंचा,
और फिर,
अपने हाथ की सारी नुची रेखाओं,
को मेरे शीशे पर एक बार,
फिर नोचते हुए बोला,
"एक रुपया!"
दरअसल, 
मैं बात करना चाहता था उससे,
लाल बत्ती पे अभी भी 
६०(साठ) लम्हें बाकी थे,
जो मैं उसे समझने में,
गुज़ारना चाहता था,
क्या वो मुझे समझ नहीं पा रहा था,
या वो मेरी समझ के बाहर था,
या मैं उसकी समझ के दायरे में न था,
पर क्या उसके पास दायरा था,
अगर नहीं,
तो वो दायरा क्यूँ नहीं मांगता था,
क्यूँ हर बार कहता था,
"एक रुपया!"
क्या था ये "एक रुपया",
क्यूँ था ये "एक रुपया!"?
मेरा मतलब,
क्यूँ नहीं था ये "एक रुपया!"
क्या वो हाथ, जो मेरे शीशे पे हर बार दस्तक देता था,
कोई कवि  था?,
और क्या ये "एक रुपया!"
उसकी कोई कविता,?
फिर मैंने उसे जाते हुए देखा,
अभी भी,
उस चौराहे पर बीस लम्हें बाकी थे,
क्या वो लम्हें कम हो रहे थे,
क्या  मैं कम हो रहा था?,
क्या  वो ख़रोंचें कम हो रही थीं,
क्या  वो दरारें कम हो रही थीं?,
क्या वो लकीरें कम हो रही थीं?,
क्या वो दिन कम हो रहा था,
क्या वो शाम कम हो रही थी,
क्या वो "एक रुपया "कम हो रहा था?,

शायद,
पर वो आवाज़ कम न हुई,
"एक रुपया!"












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