Friday, October 18, 2013

बासी रौशनी

बड़े मनहूस हैं कमरे के ये पर्दे मेरे,
न खुद ही हटते हैं,
न रौशनी को अन्दर आने देते,
सड़क पर बल्ब जलता है जो दूर,
उसकी रौशनी भी चुरा कर कैद कर ली है इनने,
अब ज़मानत भी मिलेगी तब कि जब सुबह आएगी, 

थक कर गिरेगी,
रौशनी तक फर्श पर मेरे,
मेरी चप्पल पहन कर कुछ देर तो वो खड़ी होगी,
पर जब सुबह की मज़बूत किरणें 
छेद  कर पर्दे 
ज़मीं को धुल रही होंगी अपनी सफ़ेदी  से,
तो रौशनी भी,
झुका  कर सर,
पड़ी होगी  मेरे बिस्तर ,
सिमटकर मैं,
सिमटकर वो,
इस करवट मैं,
उस करवट वो,
उठूंगा मैं, 
पर फिर भी वो,
पड़ी होगी,
अंधेरों में, 
सिलवटों में,
बिस्तर में,
मुझमें,
वो बासी रौशनी!
वो बल्ब की बासी रौशनी। 



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