Saturday, October 26, 2013

नींद

ये जो रोज़ रोज़ आ जाती हो,
बिस्तर पे,
बड़ी बेशर्म हो,
नींद !
न आहट मिलती है,
न दरवाज़ा खटखटाती हो,

मैंने महसूस तुम्हे हर रात किया,
तुम्हारे आग़ोश में तुमसे बात किया,
ये जो सपने फिरते हैं,
हर ओर,
कूदते हैं,
ज़िन्दगी में मेरे,
वो और कुछ नहीं,
वो बस अंश हैं,
मेरे,
तुम्हारे,
उन लम्हों में, जो हमने साथ साथ किया,
बड़ी बेशर्म हो,
नींद!

अभी कुछ रोज़ से,
दिन में भी,
आना होता है तेरा,
मैं पलकें बन्द करता हूँ, तो उनमें डूब जाती हो,
जो मैं खोलता हूँ,
तो पलकों को सताती हो,
बड़ी बेशर्म हो,
नींद!

ये बस तन्हाई जब होती है,
तब तुम नहीं आती,
न वो बात करती है,
न तुम्हें याद मेरी आती,
मैं बैठा रहता हूँ,
वो बैठी रहती है,
रात के तीन बजते हैं,
वो देखा करती है,
तुम्हारा क्या?
तुम किसी ग़ैर के बिस्तर पे पड़ी होगी,
हाँ जब तक तुम नहीं होगी,
ये रात रात न होगी,
मैं बैठा computer पर युहीं,
कुछ लिखता रहूँगा,
तुम्हारी याद में,
सुबह तक जगता रहूँगा,
फिर सुबह के अखबार के balcony में,
गिरने की आवाज़ सुन,
ये तन्हाई उठेगी,
तुम आओगी,
मैं सो जाऊँगा,
और हम साथ साथ कुछ और हंसीं सपने बनाएँगे।




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