Saturday, November 30, 2013

क्यूँ कि तीर चलाना बाक़ी है।

हर एक घटना, हर एक हरक़त,
उस आँख से भी तीखी है दिखे मुझे,
और इन आँखों पर पट्टी बंधी है ,
क्यूँ कि तीर चलाना बाक़ी है।

एक पर्दा था,
जो उठा नहीं,
बस छेद बड़े होते ही गए,
इस पार जहाँ मै बैठा था,
जो बादल थे, छटते ही गए,
तिनके टूटे,
वो जुगनू न थे,
आँसू फूटे,
जो बेमन थे,
नदिया, पत्ते, पौधे, पर्वत
थे नहीं कहीं भी इस कविता में,
और इस कवि के पन्ने भी,
वही उड़े,
जिन पर जो अक्षर बैठे थे,
वो बचपन से ही झूठे थे,

ये दुनिया फिर भी सोचेगी,
क्या लिखा है, हम क्या जाने,
पर अँधा नहीं हूँ, हाँ एक पट्टी है जो बंधी हुई है,
क्यूँ कि तीर चलाना बाक़ी है।

सुन लो तुम जहाँ कहीं भी हो,
अभी तीर चलाना बाक़ी है।





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