Sunday, November 17, 2013

रात के कीड़े जब सुबह तक बोलते रहे

रात के कीड़े जब सुबह तक बोलते रहे,
तो न मुर्गे सुनाई दिए,
न घर के किचन में खटखटाते बर्तन,
न नींद आई ,
न सुना मैंने चैन को,

सन्नाटों ने कब के हथियार डाल दिए,
refrigerator ने आवाज़ पे आवाज़ दी,
दूर बिगुल बजते रहे,
कुछ चेहरे,
दूर चाँद के पीछे, दिखते रहे,
याद आते रहे,
कुछ phone काटने के बाद भी,
काफी देर तक सहलाते  रहे,
pipe से घुटन पी रहा एक बीमार आदमी,
और उसके माँ बाप, ५६३ किलोमीटर दूर से भी
time to time दवा पिलाते रहे,
ऐसे ही कुछ पल आते हैं,
सालों में मेरे पास,
जो जिंदगी को जीतने कि ख्वाहिशें,
मज़बूत करते हैं,
मैं पड़ा ज़रूर हूँ,
पर सोया नहीं हूँ,
काट कर रख दूंगा, इस बिमारी को भी,
बाकियों कि तरह,
फिर उठूंगा,
और सुला दूंगा इन कीड़ों को भी,
बाकियों कि तरह,
वो मुर्गे बांग फिर से मारेंगे,
ये पर्दे फिर से खुलेंगे,,
फिर से दरवाज़ें बंद होने पर,
सन्नाटे पी  रहे pipe से घुटन होंगे,
फिर से कीड़े नहीं मैं बोलूंगा,
रातें सुनेंगी,
दिन सुनेगा,
घर सुनेगा,
हर बार मेरी आवाज़ ,
ये मंज़र सुनेगा,

"प्रणव उठ गया है !"





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