Tuesday, March 25, 2014

तुम्हे मेरी याद नहीं आती।

अब मेरी बातों पर तुम नहीं हसती,
जो मुस्कान तुम्हारे चेहरे पे आती थी मुझे देख़ते ही 
अब नहीं आती,
क्यूँ बदल गया सब?
ये जो शिकन है आँखों के ऊपर,
वो क्यूँ नहीं जाती,
यादें मायूस पड़ी हैं छत पर कबसे,
शायद तभी,
मेरी याद नहीं आती। 

अब बारिशें पहले सी नहीं होतीं,
नमी ज़यादा होती है, सुकूं कम होता है,
चाय दो लोगों की अकेले ही पी लेता हूँ मैं,
car के शीशे पे जो कुछ बूँदें बच जाती हैं,
उन्हें सूखने में भी अब काफ़ी वक़त लगता है,
वक़्त!
ही तो चला गया,
हाँ वो जो दो सुइयां हैं,
वो बराबर घूमती रहती हैं,
ढूँढा करती हैं शायद उस वक़्त को,
पता नहीं ज़िंदा है कि मर गया,
ठण्ड भी तो काफी पड़ी थी दिल्ली में इस बार। 

ठिठुरन अभी भी बाँकी  है,
नमी अभी बांकी है,
छत पर पड़ी यादों की 
मायूसी अभी भी बाँकी है। 
बाँकी  है वो वक़्त,
पर फिर भी 
तुम्हे मेरी याद नहीं आती। 












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