Thursday, April 3, 2014

सुकूं मिलता है।

चलो कुछ देर और हाथ पकड़ते हैं,
एक दुसरे का,
अभी सुबह होनी बाक़ी है,
इतने सर्द पानी में जो तुम्हारे साथ खड़ा हूँ मैं,
तुम्हारे हाथ की गर्मी से सुकूँ मिलता है।
चलो कुछ देर और भीगते हैं हम,
न जाने कल ये बादल हों न हों,
न जाने कल कहीं हम कोई छाता ले न आयें,
तुम्हारे पास ही खड़े रहने दो,
सुकूँ मिलता है।
वो जो दूर तैरती नाव है न,
वो कल नहीं होगी,
उसपे नाचती परछाइयाँ भी,
कल नहीं होंगी,
न जाने कौन सी  हवा का रुख़,
किस तरफ़ होगा,
ये मौसम कल नहीं होगा,
ये बूंदे कल नहीं होंगी,
पड़ी हैं जिस कदर ये बोतलें,
जब होश आएगा,
तुम्हारे पैर कि मिटटी से जब ये रूबरू होंगीं,
बहक जाएगा पूरा ये किनारा,
प्यार में तेरे,
अरे!
शर्माओ नहीं,
अभी कुछ और कहना है,
कि तुमसे बात करने दो,
सुकूँ मिलता है।
चलो कुछ देर और हाँथ पकड़ते हैं,
एक दूसरे का,
चलो कुछ कोशिशें कर लें,
लहर पर तैरने की हम,
न जाने कल कहीं हम कोई नाता ले न आयें,
कहीं कल आसमां में दिन जो निकले,
वो हि न डूबे,
ये पहली बार है,
कि इस कदर है चांदनी पिघली,
टपकने दो अभी इसको,
तुम अपने कान के पीछे,

सुकूं मिलता है।







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