Saturday, July 26, 2014

ये वो पल हैं जब हारते हैं, हम।

ये वो पल हैं, जो कोई नहीं देखता,
जब हम कमज़ोर होते हैं,
जब मुस्कान कहीं घुट रही होती है,
आँखें दर्द करती हैं,
चिल्लाती हैं,…
आवाज़ धीमी और दबी होती है,
की कोई सुन न ले,
शरीर कांपता है, सीना ठिठुरता है,
कुर्सी पर आधी झुकाई गर्दन को कन्धे  पर टिकाये हुए,
अपने दर्द को पन्नो पर उतारते रहते हैं,
हम।
स्याही जितनी खर्च होती है दर्द उतना बढ़ता है,
ये वो पल हैं,जब क्रोध होता है,
पर वक़्त बहुत कम,
समय भागता है, डराता है,
पर्दों के पीछे से, खिड़की के झरोखों से,
गाड़ी  में, गाड़ी की जलती रौशनी से धुली सड़क की दरारों से,
ये वो पल हैं जब हारते हैं,
हम। 

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