Wednesday, September 17, 2014

shhh..

shhh..

सोच रहा हूँ
लिखूँगा  कल,

अभी कुछ देर इस lamp की
रौशनी से इन काग़ज़ों को धुलने दो,
मेरे ख़यालों के साथ कुछ नापाक इरादे भी आ टपके हैं इनपे।

सोच रहा हूँ,
मैं क्यों लिखूंगा कल,

मेरे हर एक जज़्बात तुमसे पहले,
ये phone  पढ़ लेता है,
न जाने लिखता हूँ मैं जो तुमको वो ही जाता है,
य  सिर्फ़  खोखले अक्षरों से भरा एक message .

shhh..

अभी सिर्फ़ सोच रहा हूँ,
मैं लिखूँगा कल,

तुम घड़ी भी उतार कर रख दो वहाँ,
समय का पता भी न लगेगा,
मेरे स्पर्श का एहसास भी तुमको कल ही होगा,
सब उतार दो,
और रख दो वहाँ,

मैं लिखूंगा कल,

shhh...

अब बस सिलवटें हैं,
जिन्हे तो मैं चुप करा नहीं सकता,
तो सुनो इन्हें,
कि जबसे धुली गयी हैं,
तुम्हारी नामौजूदगी को और भी महसूस करती हैं,

इन्हें आज छोड़ कर,
मत जाना,

फिर मैं क्या लिखूँगा कल?,

shhh... 

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