Thursday, October 30, 2014

An open letter to me from my Bed.

कल रात को दिल्ली से मेरे बिस्तर का एक लम्बा चौड़ा ख़त  आया,
बड़ा हि औपचारिक ख़त  था,
और subject में लिखा था,
Pranav ! I Miss You. 

प्रिय Pranav,

आशा है की तुम ख़ुश  होगे, 
और मुझे याद करते होगे,
मुझे लगा दिवाली है,
कुछ दिए जलाने निकले हो, पर अब तीन दिन बीत गए,
और तुम घर नहीं आये,
पूरा मोहल्ला ख़ुश था परसों,
और शर्मा जी की बेटी ने भी,
श्रृंगार किया था तबियत से,
मकान सारे रौशन थे,
और उनकी महक, जब हवा चलती थी ,
तो जो खिड़की खोल गए थे तुम, जाने से पहले 
उससे हो कर मुझ तक पहुँचती थी,
उन पलों में तुम याद बहुत आये,
पर अब तो तीन दिन बीत गए,
और तुम घर नहीं आये,

शिकायत सभी को है तुमसे,
एक glass, को, जो जाने से पहले मेरे सिरहाने छोड़ गए थे तुम,
और उसमे भरे पानी को,
जिसे तुमने होठों से लगाया था,
और अब मैं शाम ढलने से पहले उसमे तुम्हारी परछाईं ढूंढता हूँ 

एक दो रूपये का सिक्का उस वक़्त से रो रहा है,
जो जब तुमने Bag  उठाया था तो कहीं तुम्हारी जेब  से फिसला होगा,
और तबसे तुम्हारे विरह में युहीं पड़ा है,
उसे चुप कराता हूँ,
तो ख़ामोशी चिल्लाती है,
बड़ा याद करती है तुमको,
तुम और वो मुझे याद है मेरे सामने पूरी रात बातें करते  थे,

इन पिछली बीती रातों में 
उन यादों के मेहमान कई बार आये,
पर अब तो तीन दिन बीत गए 
और तुम नहीं आये,

आगे और भी लिखा है
कई और शिकायतों से भरा पड़ा है यह ख़त
कई और की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा था मैं इस दिवाली को ,
बस बिना बताये घर चला आया था ,
वो बिस्तर जो हर रात मुझे सुकून देता है,
इक  बार तो बता देता,
स्वार्थ में लिप्त घर से निकलने से पहले काम से काम कमरे का एक lamp  ही जला देता,
मैं माँ बाप से मिलने के लिए
कितने ही अपनों को छोड़ आया था,
अपना office , घर, तकिया,
गाड़ी और वो बिस्तर।


फिर पापा को उनके mobile पर  शुक्ला जी का phone  आया,
पापा बोले "शुक्ला जी मैं बाद में बात करता हूँ,
और हाँ इस बार दिवाली पर  घर पर सब हैं ,
मैं, मेरी पत्नी, और मेरे दोनों बच्चे। "

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