Sunday, October 12, 2014

रात भर

होठ खामोश थे आज,
बस आँखें बोलती रहीं

रात भर।

तुम्हारे मेहमानख़ाने में ,
दो लोगों की सांसें बोलती रहीं,

रात भर।

पूरी रात बीत गयी और हमने कुछ न किया,
बस तुमने मेरा, और मैंने तुम्हारा नाम लिया,
नींद कैसे आती आज,
बताओ तुम्ही सोचो ज़रा
जब पलंग के नीचे उतरी चप्पलें,
जिन रास्तों से गुज़रीं थीं आज,
वो राहें बोलती रहीं

रात भर।

सुकून मिलता रहा,
जब बाल तुम्हारे थे,
और उनमे उँगलियाँ मेरी,
तुम्हारे होठ थे,
और उनपे रंग मेरा,
तुम्हारे कन्धों पे,
जो हमारी हरक़तों से कुछ बाल टूटे थे मेरे,
गिरे,
वो उड़े नहीं, पड़े रहे,
सटे ,
लिपटे,
चूमते,
सरकते,
उन्ही में से एक शैतान बाल था शायद,
जो तुम्हारी गर्दन से जब तुम्हारी क़मर की तरफ, बढ़ने लगा,
तो धड़कनें चुप हो गयीं,
पंखे की आवाज़ भी सुनाई न दी,
बस हवा थी,
जो बिना आवाज़,
कभी होंठों से फिसलती,
कभी उँगलियों में फंसती,
कभी कपड़ों के रेशों को फाड़ने की कोशिश करती,
झांकती,
कांपती,
महकती,
आज सब ख़ामोश  रहा,
बस,
वो हवाएं बोलती रहीं,

रात भर।



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