Thursday, October 16, 2014

कुछ दिनों के लिए, और।

किस क़दर  बदल जाते हैं,
मौसम और इन्सान,
पता नहीं लगता,
सिर्फ़  उन शाख़ों को पता होता है,
जिन पर से कुछ पत्ते टूट कर गिर जाते हैं,
उन लोगों को पता होता है,
जिनसे कुछ लोग दूर हो जाते हैं,
ये पड़ाव बदलाव का भी अजीब है,
हम जब पास होते हैं,
तो दूर जाते हैं
और दूर से,
बार बार याद आते हैं,

कभी-कभी सोचता हूँ,
मैं पागल तो नहीं हूँ,
न जाने अकेले बैठे क्या लिखा करता हूँ,
न जाने मैं जो लिखता हूँ,
उसका मतलब तुम समझते हो,
या हर बार अधूरा पढ़ कर,
computer बंद कर देते हो,

किस क़दर बदल जाते हैं,
चेहरे और हालात,
पता नहीं लगता,
सिर्फ़  उन चेहरों को पता होता है,
जिनपे हाथ कोई और फेरता है,
किसी और की साँसों पे कुछ दिन और जीते हैं वो,

और वो पत्ते कब के उड़ गए हैं,
अब तो balcony के ठीक सामने,
तने पर कुछ खिल रहा है,

कुछ दिनों के लिए, और। 

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