Monday, January 19, 2015

मैंने देखा।

मैं जितना पास जाता,
वो उतना मेरे सर पे चढ़ने की कोशिश करता,
उठाता ज़रा और फेंकता ज़्यादा,
फ़र्क नहीं है
उस रोज़ जाना मैंने इंसान और समन्दर  में,
बस एक होड़ है जीतने की,

गलत कहतें हैं सब,
कि बड़ा ख़ूबसूरत है समन्दर,
न जाने क्यूँ ,
सब डरते हैं,
दबते हैं,
कमज़ोर हैं,
वो डराता  है,

मैं खड़ा रहा,
एक लहर भी पकड़ में आई मेरे,
मैंने pocket में रखा,
दायीं वाली में,
उसे बोलना नहीं आया था अभी,
कुछ दूर पर ही उसकी बूढी बीमार दादी का इंतेक़ाल हुआ था आज,
मैंने देखा,
ये वो लहरें हैं जो वक़्त के साथ कमज़ोर पड़  जाती हैं,
या जिन्हें मछुवारों के जाले ने चोटिल किया होता है,
तो फ़ेंक दी जाती हैं किनारों पर,
तड़पने को,
मातम मानाने को,
फ़िर मैं उस लहर को pocket में लिए,
किनारे तक ले आया,
उदास थी बेचारी,
पूरे रास्ते रोती  रही,
भिगा दी pocket सारी,
और वहीँ कहीं शाम के अंधियाले में दम  तोड़ दिया उसने भी,
तो मैंने पास की ही रेत  में दफ़नाया उसको,
ग़लती  सब की नहीं है,
कुछ हैं जो इंसानो से अलग हैं,
पर वो बहुत जल्द दम तोड़ देती हैं,
कुछ हैं,
जो खूबसूरत हैं,
पर या तो वो दबी हुई हैं,
या जब कहीं किसी किनारे पर शाम के वक़्त अपनी
आखरी बची साँसे ले रही होती हैं,
तो कोई कुत्ता उन पर मूत जाता है।
मैंने देखा।






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