Tuesday, February 2, 2016

दर्द

दर्द होता है तो होने दो,
दर्द साफ़ होता है,
जैसे फेफड़ों में जाती हुई सांस का एहसास भले न हो,
पर जब दम घुटता है तो सब साफ़ होता है,
क्यूँ कि  दर्द होता है,
दर्द छलावा नहीं करता,
कपट नहीं करता,
बस होता है, साफ़,
 तो होने दो।

दर्द नासूर सा है, मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ,
पस  की वो बूँदें तो कागज़ पे उत्तर आती हैं।

पर न जाने कितने दिनों से,
ये कागज़ कोरे हैं,
कई बार दिखती हैं कहानियां इन पर नाचती हुई जो बीती हैं,
पर दर्द होता नहीं अक्सर, तो  साफ़ नहीं होतीं की मैं बताऊँ उन्हें,
बस कुढ़ के रह जाती हैं, भीतर कहीं।
एक वक़्त था,
जब बेशुमार दर्द था,
लोग कम  थे,
और यादें कई,
आज लोग हैं,
यादों में दम नहीं,
तो दर्द नहीं होता,

बस घुटन है, कुढ़न है, और कैद सा एहसास,
एक अजीब सी ज़िन्दगी है हर तरफ़
Regular,
पर न जाने कितने दिन बीत गए,
और दर्द नहीं होता,
लाशों को भी दर्द नहीं होता,
लाशें रोती नहीं,

तभी जो धागे थे,
वो काट दिए मैंने,
पर न जाने कितने कमज़ोर धागे थे
की ये कपड़े  बिलखते नहीं,
और अब भी  दर्द नहीं होता।



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