Tuesday, February 9, 2016

कब का उड़ जाता

कुछ परदे हैं,
जिन्होंने जकड़ा है,
नहीं तो कब का उड़ जाता ,

ये आसमान यहीं तो रखा है,
मेरी balcony  के ठीक सामने।
मकान दो मंज़िल का है,
पर कई बार छुआ है मैंने आसमान को,
ठण्ड के कोहरे में छिप कर आता है कभी- कभी मिलने मुझसे।
ये पिछली बार लेलो,
बोला " बड़ी देर लगा दी तुमने, तुम्हरी Parking में जो  पीपल है,
उसपे लटका वो आखरी चूज़ा भी उड़ गया था कल शाम होने से पहले,
और तुम्हारे पंख ही न निकले अब तक।"
मैंने कहा वो चूज़ा है,
इंसान नहीं,
बस पंख ही तो हैं कुछ,
जो अगर काट जाएंगे तो फिर क्या होगा,
मेरे तो इरादे ही उड़ा  ले जाएंगे एक दिन, देखना तुम,
बस कुछ परदे हैं,
जिन्होंने जकड़ा है,
नहीं तो कबका उड़ जाता ।

कभी आओ मेरे कमरे में तो देखना तुम,
मेरा बिस्तर भी पैर नहीं रखता ज़मीन पर,
चादर तो उतरती ही नहीं नीचे कि कभी ओढूँ उसको,
चप्पलें उड़ती हैं रात भर, मेरे आँगन में, कि कहीं मैं सो के न उठूँ,
कभी ध्यान से देखा है?
मिले फुर्सत, देखना तब,
पेशाब भी गिरती है, बारिश बन कर, तो सींचता हूँ Toilet रोज़ाना,
बस ये तो कुछ पर्दे  हैं,
जो उड़ते नहीं, और न उड़ने देते,
जकड़  रखा है सालों ने,
सालों से,
नहीं तो कब का उड़ जाता।

अच्छा कुछ आदत भी है, ज़माने की,कमाने की,
उसकी बोटी, मेरी रोटी,
नोचो और जितना नोच पाओ,
मांस हि  तो है, दोबारा भर आएगा,
बस इतना याद रखना कहीं ये पर्दे  न फट जाएँ,
नहीं तो होगी बारिश लगातार,
सर पे तुम्हारे,
धार भी तेज़ होगी,
जलेगा बदन सारा,
आग भी होगी।
फिर उड़ूंगा zip बंद करके,
कई सदियाँ मैं,
बस ध्यान रखना , कहीं ये पर्दे  न फट जाएँ,
बस इन्ही तो रोका  है,
नहीं तो कब का उड़ जाता















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