Sunday, June 26, 2016

18:50 hrs

ज़रा सा गड़बड़ हुई, .. मुझे लगा,
पर यहाँ तो समन्दर ही डूब गया,
एक चट्टान है,..  कुछ दूर पे,
जो पहले पानी में दबी होगी,
अब बस एक टक देखती है,
और चिढ़ाती है,
न लहरें बची हैं,
न कश्तियाँ, 
fuck कश्तियाँ, who cares. 
दिन डूबता ही नहीं,
कि  शाम आये,
बस अँधेरा  छा जाता है,
बिना बताये,.. रोज़,
रेत पे जो पिछली बार नक़्शे बनाए थे,
वो बेनामी से सूख गए,
और हवा उड़ा ले गयी 
न जाने कहाँ,
अब पता ढूंढ़ता हूँ,  बस,
तो पता नहीं। 


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