Thursday, June 9, 2016

पता नहीं, 
ये रास्ता यूँ ही रहेगा,
या उस मोड़ के बाद,
और भी सकरा हो जाएगा,
पता नहीं,
ये जूते कब तक चलेंगे,
ये टूटे हुए phone ,
से आवाज़ आएगी भी आगे या,
या कटे हुए cable  के बाद की  
खरखराहट सताएगी कानो को,
पता नहीं,

ये मैली चप्पलें धुलेंगीं,
तो रास्ते खुलेंगे,
या रास्तों के खुलने के बाद ये चमकेंगी 
पता नहीं,

जो रोज़ लटकता हूँ जा कर पार्क में,
न जाने कितने लटकते होंगे,
कई सालों से,
कितनों का मैल,
साफ़ करता हूँ, 
हर शाम मैं,
पर हाथ थकते नहीं,
बस तिनका तिनका छिलते  रहते हैं,
पता नहीं,
कब वो शाम आएगी जब वो Rod  फिर से चमकेगी,
जैसी बनी  थी बरसों पहले,

पता नहीं,
क्यूँ इतनी बेचैनी है,
सीने में दाईं तरफ़ जहाँ दिल नहीं होता,
वहां दर्द रहता है आज कल,
migration की नयी कहानियां लिखने लगा है दिल। 

पता नहीं,
जब रात आती है,
तो चुपचाप आती है,
चुपचाप kitchen  में,
चुपचाप shower  में,
चुपचाप कमरे में,
Balcony में कभी कभी बोलती है,
पर मुझसे नहीं बोलती,
सीने पे हाथ भी नहीं रखती,
दायीं तरफ़ 
बस चुपचाप 

पता नहीं बीच बीच में 
AC की तरफ़ देखती है,
तो वो भी मुड़ता है देखने को,
TV  की तरफ़ देखती है,
तो ad.  आ जाता है,
पता नहीं 
कब तक चलेगा ये,
ये जूते कब तक चलेंगे। 




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