Tuesday, September 6, 2016

अब शाम नीली नहीं होती

दिन बीत रहे हैं,
रातें कटती जाती है,
न जाने 
ये शाम नीली कब होगी,
मंज़िल कोई भी हो इमारत की,
न अब ऊंचाई से डर  लगता है,
न तन्हाई से डर लगता है,
बड़ी jaded सी महसूस होने लगी है ज़िन्दगी 
न जाने 
ये शाम नीली कब होगी,
हवा अब य तो लगती नहीं है,
य थपेड़े मारती है ज़ोरों से चेहरे पे अक्सर,
वो जो नाज़ुक सा एहसास था कभी,
पूरब से चलती थी,
तो पश्चिम फिसलता था,
पश्चिम में आ कर कहीं खो जाती थी,
तो मैं ढूंढता था,
हम जब मिलते थे,
शाम तब होती थी,
बूंदे पड़ती भले न हों , पर बारिश ज़रूर होती थी,
अब बारिश नहीं होती,
बस monsoon  में भीग जाता हूँ कभी कभी,
और दिन बीतते रहते हैं,
रातें कटती रहती हैं,
पर अब शाम नीली नहीं होती। 





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