Monday, July 17, 2017

टुकड़ों में


एक लड़का दिखता है,
जब भी बचपन याद करता हूँ,
दुबला सा,
रौंगटे भर बाल आना शुरू हुए हैं गालों पर,
और वो, अपने तिमंज़िले मक़ान की,
छत के पीछे वाले कोने पे बैठ के,
सपनों का parabola नाप रहा है,
कि कितनी दूर जाएंगे,
पीछे मैदान में,
हर एक फेंकी हुई ईंट... 
के टुकड़े से।
फिर, एक लड़का दिखता है,
bike पे अकेला चला जा रहा है,
कुछ मांस भर आया है,
और बाल कुछ बड़े हुए हैं,
और helmet सिर्फ़ इसलिए लगाया है,
क्यूंकि यकीन है,
कि उतारते ही पहचान लेंगे, सब लोग, ... अब से कुछ सालों के बाद,
तो practice बनी रहे,
कि जब वक़्त आये, तो uncomfortable महसूस न हो।
फिर,... एक लड़का है,
जो  ज़्यादा बोलता नहीं है,
बस या तो analyse कर रहा है,
या observe,
क्यूंकि वो जो कहना चाह रहा है,
वो शब्द नहीं मिल रहे,
और जो करना चाह रहा है,
वो मौके।

-प्रणव मिश्र

















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