Thursday, July 6, 2017

हर रात।

कई बार कुछ नहीं आता ज़हन में,
क़िताब लेकर,
उसके किन्हीं दो पन्नों के बीच में diary फंसा कर,
सारी रात बैठता हूँ,
१ बजता है... 
२ बजता है.. 
३ बजता है,
पेशाब करता हूँ,
balcony पर जाकर सामने parking में,
झाँक कर देखता हूँ, गाडी खड़ी है या नहीं,
रोज़ खड़ी मिलती है,
फिर.. 
४ बजता है,
फिर bathroom में जाकर शीशे में,
अपनी शक्ल देखता  हूँ... 
तब तक ५ बज जाता है, 
और बेमन सोता हूँ, 
अमूमन हर रात। 



-प्रणव मिश्र 







No comments:

Post a Comment