Friday, August 18, 2017

...और शाम हो जाती थी।

महीनों गुज़र जाते हैं..
गुज़ारिश करते-करते,
पर अब वो पहले की तरह... 
नहीं छूती मुझे,
मेरी छाती पर जो चेहरा रख कर,
फुसफुसाती थी,
मेरे कानों पर उंगलियां चलाते हुए,
मेरी गर्दन पर नाख़ून,
मेरे चेहरे से उतर कर कब उसकी साँसे दिल तक पहुँच जाती थीं,
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
मौसम बदल जाते हैं,
उसका नाम लेते -लेते,
पर अब वो पहले की तरह... 
नहीं बुलाती मुझे,
मेरे होठों पर कितने घंटों ही,
फूंकती थी जान अपने होंठों से,
कहती थी,
बार-बार, तो यकीन नहीं होता था,
कि वो मेरी है,
और यकीन दिलाते-दिलाते,
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
शाम हो जाती थी... तब नशा होता था,
वो roll बड़ा अच्छा करती थी,
मेरे शरीर पर,
मैं पकड़ता था कमर पूरे हक़ से,
और वो कुछ नहीं कहती थी,
एक current सा लगता था हांथों में,
उसका हाथ पकड़ते ही,
वो जिस तरह से देखती थी पीछे मुड़ कर,
मैं सो नहीं पाता था उसके बिछड़ने  के डर से,
सुबह तक,
और सुबह से दोपहर,
और दोपहर से न जाने कब... 
पता ही नहीं चलता था,
और शाम हो जाती थी। 
पता है कल क्या बोली,
"बड़ा tiresome है ये"... "मतलब प्यार है, पर प्यार सब कुछ तो नहीं"
पूरी रात रोया मैं,
और लिख कुछ नहीं पाया,
काश कि वो देखती मुझे रोते हुए,
और कहती "कि प्यार है, तो पहले क्यों नहीं बोला"
पहले तो कुछ कहते ही नहीं थे,
और शाम हो जाती थी। 
शाम हो जाती थी, तो जान आती थी,
सब हल्का-हल्का सा लगता था,
अब तो एक वज़न है,
जो जीने नहीं देता,
दो साल हो गए और एक भी रात नहीं कटती,
उसको तरस भी नहीं आता मेरी हालत पर,
पहले तो पता ही नहीं चलता था,
की किसको ख़याल किसका पहले आया,
और शाम हो जाती थी। 




-प्रणव मिश्र 








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