Thursday, October 12, 2017

... और एक कम्बल था ।

खाल भी घिस रही थी खाल से,
और कुछ दिख भी नहीं रहा था,
अँधेरा था,..
... और एक कम्बल था,
तो, और भी अँधेरा था।
नाख़ून थे जो चुभ भी रहे थे,
और कुछ दुख भी नहीं रहा था,
पसीना था,.
...और एक कम्बल था,
तो और भी पसीना था।
रगड़ थी,..
रगड़ते- रगड़ते, बहुत कुछ हो भी रहा था,
सटा था,
... और एक कम्बल था,
तो जिस्म जिस्म से और भी सटा था।
हाथ फिसल रहा था,
और बहुत कुछ दब  भी रहा था,
ज़बान रुक ही नहीं रही थी,
और दांतों से जगह जगह कट भी रहा था,
कटना तो था ही,
पर एक ही कम्बल था,
तो और भी कट रहा था।
... एहसास था,
की जो छू रहा था,
वो प्यार नहीं था,
पर छिपना था कहीं,
....और एक ही कम्बल था,
बस दोनों को उस रात कहीं छिपना था।

-प्रणव मिश्रा

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