Sunday, October 29, 2017

क़रीब तुमसे,
उन लम्हों में महसूस होता है,
जिन लम्हों में तुम,
चीख़-चीख़ के मेरा नाम लेती हो।
जब तुम्हारी आँखें बन्द करता हूँ,
और तुम्हें ये नहीं पता चलता,
कि होंठों से तुम्हारे,
मेरे शरीर का कौन सा,
हिस्सा  टकरा रहा है,
और तुम कुछ देर सोचती हो,
फिर कहती हो "yuck"
और फिर
चीख़-चीख़ के मेरा नाम लेती हो।

उन लम्हों में महसूस होता है,
जिन लम्हों में,
तुम बैठती हो मेरी कमर के ऊपर,
बिन कपड़ों के,
और मुझे बिन कपड़ों के देख,
कहती हो "yuck",
फिर,
चीख़-चीख़ के मेरा नाम लेती हो।


हर बार लगता है,
ये शीशे में,
तुम भी ज़्यादा हिलती हो,
मैं भी ज़्यादा हिलता हूँ,
और कई बार तो सिर्फ़,
boomerang सा लगता है,
unnatural.
पर जब तुमको देखता हूँ,
तो slow motion में होते हैं हम,
 तुम्हारा मुँह भी खुलता है,
तो खुला रहता है,
आँखें देखती हैं मुझको,
तो देखती रहती हैं,
पसीना बहता है,
तो तुम्हारे सीने से,
मेरी कमर तक आने में,
काफ़ी वक़्त लेता है,
और फिर,
उसके आगे कुछ नहीं दिखता,
तुम हाँफ़ती रहती हो,
मैं हाँफता रहता हूँ,
पर करीब तुमसे,
उस वक़्त भी उन लम्हों में महसूस होता है,
जब तुम,
चीख़-चीख़ के मेरा नाम लेती हो।


otherwise,..
तुम भी busy रहती हो,
और मैं अकेले बैठे,
यही लिखता रहता हूँ।




-प्रणव मिश्र 

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