Monday, November 27, 2017

ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये बेचैनी मुझसे कम क्यूँ नहीं होती,
ये आधी रात के बाद हि क्यूँ जगता है मन,
ये अकेला सा जो महसूस होता है,
ये क्या है?..
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?

ये रात भर यूँ ही तकिये पर,
जो सर रखा रहता है, और कुछ नहीं कहता,
ये क्या है?...

करवट बदलने पर जब तुम्हें नहीं पाता हूँ,
तब बहुत अकेला महसूस करता हूँ,
हाथ रख-रख कर कम्बल को कई बार टटोलता हूँ,
शायद आवाज़ आ जाए,..
"अब सो क्यों नहीं जाते?"

उठ-उठ कर कई बार,
फैंकता रहता हूँ, रज़ाई का दूसरा कोना,
बिस्तर के दूसरी तरफ़ ,
कि याद है, तुम कहती हो
"तुम्हारी खींच तान में, खुले रहते हैं,
और मेरे पैर, पूरे नहीं आते। "

ये जो शायर सा महसूस होता है,
तुम्हारी नामौजूदगी में,
पर शायरी नहीं आती,
ये क्या है?...

ये जो खुली आँखों से,
पँखे पे धूल के निशानों को मिला-मिला कर,
तुम्हारी तस्वीर बनाता रहता हूँ,
पर उसमें से तुम्हारी आवाज़ नहीं आती,
ये क्या है?...

ये क्या है, कि  जब चाहता हूँ,
छू लूँ तुम्हें,
पर तुम पास नहीं होती,
और जब पास होती हो,
तो छू कर भी छू नहीं पाता,
ये क्या है,
ये मैं हूँ, य तुम्हारी कमी?


-मिस्रा



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