Friday, December 22, 2017

खिंचते चले आये, जिस्म दोनों,
मुट्ठियाँ बंद रहीं, मुँह ख़ामोश, 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
तो हाँथ भी नहीं रखा दोनों में,
.. किसी ने किसी के ऊपर,
बस,..  एक गर्दन की गर्मी से,
एक गर्दन की नमी सूखती रही। 
वो बैठा रहा बिस्तर पर,
और वो बैठी रही गोद में उसकी,
किसी ने कुछ नहीं करा,
बस,.. एक छाती की रगड़,
एक छाती में जान फूँकती रही।
कलाई ख़ुद-ब-ख़ुद,
खोलती रही, ... मुट्ठी को,
उँगलियाँ कमर में गड़ोई गयीं, 
कि कहीं कुछ पकड़ न लें, और 
कहीं कुछ ग़लत न हो जाये,.. 
एक नाक सूंघती रही कुछ बालों को दो सूत की दूरी से,
कानों की लौ गरम होती रही,
और वो उसकी पोशाक का एक कोना पकड़े रहा,
जो एक  जांघ से एक जांघ तक,
ज़र्रा - ज़र्रा  फिसलती रही। 
न उतरी, न उतारी गयी,
पर ख़यालों में, एक खाल में ढली खंजर,
ख़यालों में, एक खाल के बहुत अन्दर,
ख़ुद-ब-ख़ुद  उतरती रही। 



-मिस्रा 






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