Thursday, February 1, 2018

एक शर्म के पीछे।

सबके गले सूखे हैं,
सबकी नसों में आग है,
सबकी लार घुट रही है
एक शर्म के पीछे।
एक शर्म के पीछे,
बस एक ही दीवार है,
न तोड़ पा रहा है कोई,
न छुप हि पा रहा है।
और सभी तो नंगे हैं,
और सभी तो भूखे है,
और सभी तो छूते हैं,
खुदको...
एक शर्म के पीछे।

एक शर्म के पीछे ही जो है,
वो इंसान है,
बाकी तो सिर्फ़ कपड़े हैं,
हया है, डर है, और संकोच,
सबकी आँखें झूठी हैं,
सबकी नाभि प्यासी है,
सबकी हवस घुट रही है,
एक शर्म के पीछे।


-मिस्रा 

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