Monday, February 26, 2018

कितनी सारी गलतियों में, कितनी सारी ज़िन्दगी चली जाती है।

वो सारे सवाल रह जाते हैं,
सारे वादे,
एक ख़्वाब रह जाता है,
दो चार यादें,
कहीं एक जगह ख़ाली रह जाती है,
जो फिर कभी नहीं भरती,
और तेज़ ठण्डी हवा में जब कानों में,
वो गाना, जो कभी साथ बैठ कर गाते थे, पड़ता है,..
तो रोएं भी खड़े होते हैं,
और आँखों के सामने का मंज़र,
गाड़ी चलाते-चलाते अचानक,
एक water colour की painting में,
तब्दील हो जाता है,
कुछ नहीं दिखता,
तो गाने को रोकना पड़ता है,
क्यूंकि गाड़ी अब रुक भी नहीं सकती,
और इतने गड्ढों से हो कर आयी है अभी,
कि पीछे जा भी नहीं सकती,
सारी ख़ुशी बीते गानों में रह जाती है,
और कविताओं के हिस्से सिर्फ़ मायूसी बचती है,

कितनी सारी गलतियों में,
कितनी सारी ज़िन्दगी चली जाती है,
लोग कहते हैं जो गया है
उसे जाने दो,
और मोड़ें आएँगी,
आगे और भी बहुत कुछ है,
तो आदमी चलता रहता है, भीड़ के भरोसे,
पर आगे न फिर कभी कोई वो गाना गाता है,
न उस तरह से देखता है,

कितनी सारी गलतियों में,
कितनी सारी ज़िन्दगी चली जाती है,
कितना भी हंसा ले कोई फिर,
कोई उतना कभी उस तरह से रुला नहीं पाता,

वो उठता है,
अपना चेहरा बार-बार साफ़ करता है,
पर उम्र कभी धो नहीं पाता,
और अंदर कहीं बहुत अंदर,
एक लड़का तिलमिलाता रहता है,
चीख़ता चिल्लाता रहता है,
पर ज़िन्दगी में फिर कभी,
कोई उसे छुड़ा नहीं पाता।

कितनी सारी गलतियों में,
कितनी सारी ज़िन्दगी चली जाती है,
और कोई किसीको फिर कभी,
उस जगह वापस बुला नहीं पाता।

-मिस्रा

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