Saturday, February 3, 2018

एक लम्हा सा कैद है ...

एक लम्हा सा कैद है,
जिसमे तुम अब एक ख़याल हो,
... और ज़िन्दगी है,
और कितना ज़िंदा हूँ मैं,
और कितनी ज़िंदा हो तुम,
कितनी ख़ामोशी है,
पर कितना कुछ कह रहा हूँ मैं,
और कितना कुछ कह रही हो तुम।
कितनी मासूम हो तुम,
कितना खोया हूँ मैं,
कितनी कम दूरी है,
तुम्हारे कितने पास सोया हूँ मैं,
किस तरह से लिखूं ,
कि किस तरह से देख रही हो तुम,
और किस तरह से तुम्हें देख रहा हूँ मैं।
तुम एक ख़याल हो,
उस लम्हें का,
अब जिसे भूल चुकी हो तुम,
अब जिसे भोग रहा हूँ मैं।


-मिस्रा







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