Thursday, May 17, 2018

27.04.2018

अपनी ज़िद में कितना कुछ हो जाता है,..नहीं?
और ज़िन्दगी को हम छुड़ाने नहीं जाते,
ज़िन्दगी सिसकती रहती है,... अपने अपने कमरों में,
पर हम एक दुसरे का दरवाज़ा,.
फिर खटखटाने नहीं जाते।
हम हाथ नहीं रखते फिर एक दूसरे के सर पर,
हम नहीं सहलाते बालों को,
हम दूर दूर  बैठते हैं,
एक दूसरे की शक्लों को ताका करते हैं,
पुरानी तस्वीरों में,
एक दुसरे के खतों को पढ़ते हैं,...
फिर रख देते हैं,
फिर पढ़ने लग जाते हैं,..

हम कितने कमज़ोर पड़ जाते हैं।


-मिस्रा 

No comments:

Post a Comment