Monday, May 21, 2018

किसी से कुछ नहीं कहता

अब सिर्फ़ राख़ बची है,
जो जब बारिश में डूब कर शक़्ल पर पड़ती है,
तो पोंछते ही फैल जाती है,
और, आईने में चेहरा,..
... काला पड़ जाता है।

बहुत दर्द होता है,
पर छुपा लेता हूँ,
किसी से कुछ नहीं कहता,
वो भी कहीं किसी कोने में,
यूँहीं दर्द में मुँह छुपाये,
रो रही होगी,
एक तकिये में मुँह दबाये,
चीख़ रही होगी।

ये जो गला इतनी जल्दी-जल्दी,..
... सूख जाता है,
और मुँह बासी,
किसी से कुछ नहीं कहता।

"किसी से कुछ क्यों नहीं कहते?..
किसी के सामने, मैं तुम्हारी हूँ , ये कह कर,...
.. तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेते?..
मेरे चारों तरफ़ देखो सब कितने खुश हैं।
उनकी तस्वीरें देखती हूँ,
तो बहुत जलता है मन,
और तुम हो, न जाने किस बात से डरते हो,...
ये दरवाज़ों के बंद होने के बाद ही,
.. baby - booboo क्यों करते हो?"

जो उसको पहली रात से आख़री रात तक,
हर रात मैं, एक किस्सा सुनाता था,
पर उसको बड़ी जल्दी नींद आ जाती थी,
.... हटाओ ....
किसी से कुछ नहीं कहता।

"किसी से कुछ क्यों नहीं कहते?,
ये हर रात जो अपने प्यार का,
इज़हार मुझसे करते हो,
मैं तुम्हारी आँखों में देखती हूँ,
और मुझे पता है,
मुझसे बेइंतहा प्यार तुम करते हो,

फिर, किसी से कुछ क्यों नहीं कहते?"

किसी से कुछ कहना भी क्या ज़रूरी है?
क्या बिना छतों से चिल्लाये,
... मेरी मोहब्बत अधूरी है?

वो पानी मारता रहता है,
पर दाग़ कभी छुड़ा नहीं पाता,
चेहरा खुरच जाता है,
ख़ून बहने लगता है,
पर क्या दर्द करता है,
ये बता नहीं पाता ,
कुछ लिखता है हर रोज़,
पर पंक्तियाँ मिला नहीं पाता,
तो खुद ही को दोष देता है उम्र भर,
पर और...
किसी से कुछ नहीं कहता।


मिस्रा


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