Friday, August 10, 2018

cognitive problem

मेरी तरफ़ देखते- देखते उसकी आंखें सूखती गयीं,
बड़ी होती गयीं,
और मैं...  और छोटा। 
इतना छोटा, और कितना असाहय,
कितना अकेला। 
कितना कुछ है कहने को उससे,
पर वो अब सुनता नहीं,
बस एक टक देखता रहता है,
कभी-कभी कुछ बोलता है, तो ख़यालों का.. 
.... न सर होता है, न पैर। 

कुछ समझ नहीं आया,
क्या हुआ? ... कैसे हुआ?
सब कहते रहे, "कितने मज़बूत हो तुम, ... कितने कारगर"
मैं सुनता रहा और खुद पर अनजाने शायद फ़क्र करता रहा। 
आज लिख रहा हूँ, तो बहुत शर्म आती है ख़ुद पर,
उधर कोई कराह रहा है,
और इधर मैं बस लिख रहा हूँ कि वो कराह रहा है,
कितना छोटा हूँ मैं। 
पर bukowski सही कहता था,
"Poetry is what happens when nothing else can"

कुछ नहीं कर पाया मैं। 



-मिस्रा 








 

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