Wednesday, September 12, 2018

जबसे तुम गयी हो, बहुत नज़दीक आ गयी हो।

जबसे तुम गयी हो,
न वो बिस्तर बदला है,
न सिलवटों को छेड़ा है मैंने,
रात भर एक किनारा पकड़ कर सोया भी हूँ मैं,
रात भर तरसते हैं होंठ, .. छाती को तुम्हारे,
रात भर उँगलियाँ दर्द करती हैं,.. 
रात भर कोई गाना सुनाता है, ऐसा लगता है,
कोई फेरता है हाँथ बदन पर, ऐसा लगता है,
कोई कस कर पकड़ता है, ऐसा लगता है,


कितने नज़दीक आ गयी हो?
रात भर तुम्हारी तस्वीर बात करती है मुझसे,
तुम्हारे बालों के ख़म में उलझा भी हूँ और खोया भी हूँ मैं,
ऐसा लगता है,... 
जबसे तुम गयी हो,
बहुत नज़दीक आ गयी हो। 


-मिस्रा 


 

No comments:

Post a Comment