Friday, October 26, 2018

वो भी, ... मैं भी

न जाने प्यार कब और कैसे,
क़ब्ज़ेदारी में तब्दील हो जाता है।
अधिकार,अपेक्षाएं, ज़िम्मेदारियों के बोझ तले,
आदमी दबता जाता है।
तिलमिलाते हुए कई बार गर्दन निकालता है बाहर,
पर तब तक और मैला चढ़ जाता है।

कमज़ोरी सिर्फ़ दिमाग़ की होती है,
दिल तो बस झटके खाता है,
उसका भी, .. मेरा भी।

जुबां तक बार-बार बात आती है,
हलक़ में फंसे हुए आंसुओं की तरह,
पर प्यार न जाने कब कहाँ छन के गिर जाता है,
बात हो नहीं पाती और,
शब्द चुभते रहते हैं उन पलों में,
उसके भी,... मेरे भी।

कितनी छोटी है ज़िन्दगी,
और हम कितनी बड़ी बातें कर जाते हैं,
उनसे, जिनसे प्यार करते हैं,
क्यों नहीं गले से लगाते उस वक़्त,
ज़रुरत होती है जब,
उसको भी, ... मुझको भी।


-मिस्रा 

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