Sunday, November 4, 2018

एक बहुत ऊँची चट्टान पे,
बहुत सारी बर्फ़ पड़ी थी,
ये उसके बारे में नहीं है,
पास के पहाड़ों पे सफ़ेद आंधी चल रही थी,
और यहाँ बंकर सारे अंदर से बंद,
ये उसके बारे में नहीं है,
एक लड़की बहुत कूद -फांद कर रही थी,
कुछ दुरी पर,
और एक लड़का सन्न,
ये उसके बारे में नहीं है,
नदी, पहाड़, झरने, वादी, सभी तो लिखते हैं,
ये उसके बारे में नहीं है। 
पहाड़ी से थोड़ा नीचे उतरते ही,
दाहिनी ओर सड़क के एक छोटी सी गुमटी थी,
जहाँ चाय बन रही थी,
उसके कुछ ठीक दस कदम पे पश्चिम की ओर,
एक पेशाबखाना था, जहाँ सिटकिनी लगी थी,
बहुत invite कर रही थी,
ये उसके बारे में है,
कदम धीरे- धीरे बढ़ रहे थे, तीन चाय बोलने के बाद,
(अरे भाई, एक driver  भी तो था)
कितनी तेज़ लगी थी,
,.... कुण्डी भी,
कितनी मशक्क़त के बाद खुली थी,
और अंदर किवांड़ खोलने के बाद,
हफ़्तों की सूखी पड़ी हुई टट्टी बर्फ़ की चादर ओढ़े कितनी हसीन लग रही थी,
पैर फिसल रहे थे पीली बर्फ़ पे,
तो मानो earthy colors में एक रचना रच रही थी,
नीचे फ़र्श पे,
पूरे सफ़र में सिर्फ़ यही तस्वीर नहीं ली थी। 



-मिस्रा 









No comments:

Post a Comment